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RTI MCQ SEC 8-12 : टीम अभिव्यक्ति

 प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8 में विहीत के अनूसार  कौन सी सूचना के प्रकट किए जाने हेतू छूट दी गई है?

उत्तर-धारा 8 - सूचना के प्रकट किए जाने मे छूट

इस अधिनियम के अतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इसमें अन्यथा उपबंधित के सिवाय, निम्नलिखित सूचना को प्रकट करने से छुट दी जाएगी, अर्थात-

(क)  सूचना जिसके प्रकटन से,

i. भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, रणनीति वैज्ञानिक या आर्थिक हित विदेश से संबंध पर प्रतिकूल प्रभाव पडता हो; या

ii. किसी अपराध को करने का उद्दीपन होता हो;

       (ख) सूचना, जिसके प्रकटन से किसी न्यायालय या अधिकरण द्वारा अभिव्यक्त रूप से निषिद्ध किया गया है या जिसके प्रकटन से न्यायालय का अवमान होता हो;

      (ग)  सूचना जिसके प्रकटन से संसद या किसी राज्य के विधान –मंडल के विशेषाधिकार भंग हो संकेत हो;

      (घ)  सूचना, जिसमें वाणिज्यिक विश्वास, व्यापार गोपनीयता या बौद्धिक संपदा, सम्मिलित है, जिसके प्रकटन से किसी तीसरे पक्षकार की प्रतियोगी स्थिति को नुकसान होता है;

 परंतु यह कि ऐसी सूचना को प्रकट किया जा सकेगा यदि लोक सूचना अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी सूचना का प्रकटन विस्तृत लोक हित समाविष्ट है;

  (ड)  किसी व्यक्ति को उसकी वैश्वासिक नातेदारी में उपलब्ध सूचनाः

  परंतु यह कि ऐसी सूचना को प्रकट किया जा सकेगा यदि लोक सूचना अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी सूचना के प्रकटन में विस्तृत लोक हित में आवश्यक है;

(च)  किसी विदेशी सरकार से विश्वास में प्राप्त सूचना;

(छ)  सूचना, जिसके प्रकट करने से किसी व्यक्ति के जीवन या शारिरीक सुरक्षा के लिए या सूचना के संसाधन की पहचान करने में या विश्वास में दी गई सहायता या सुरक्षा प्रयोजनों के लिए खतरा होगा;

(ज) सूचना, जिसके प्रकट करने से अन्वेषण या अपराधियों के गिरफ्तार करने या अभियोजन की क्रिया में अडचन पडेगी;

(झ)  मंत्रिमंडल के कागजपत्र, जिसमें मंत्रिपरिषद के सचिवों और अन्य अधिकारियों के विचार –विमर्श के अभिलेख सम्मिलित है;

 परंतुयह कि मंत्रिपरिषद के विनिश्चय उनके कारण तथा यह सामग्री जिसके आधार पर विनिश्चय किए गए थे, विनिश्चय किए जाने और विषय को पूरा या समाप्त होने के पश्चात जनता को उपलब्ध कराया जाएगा;

      परंतु यह और कि वे विषय जो इस धारा में सूचीबद्ध छूटों के अंतर्गत आते है, प्रकट नहीं किए जाएंगें।

(त्र)  सूचना, जो व्यक्तिगत सूचना से संबंधित है, जिसके प्रकट करने का किसी लोक क्रियाकलाप या हित से संबंध नहीं है या जिससे व्यष्टि की एकिन्तता पर अनावश्यक अतिक्रमण नहीं होता है;

     परंतु यह कि ऐसी सूचना प्रकट की जा सकेगी यदि यथास्थिति, सूचना अधिकार या अपील प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी सूचना का प्रकटन विस्तृत लोक हित में न्यायोचित है। 

1) ऐसी सूचना से, जिसको, यथास्थिति संसद या किसी राज्य विधान मंडल को देने से इंकार नहीं किया जा सकता है, किसी व्यक्ति को इंकार नहीं किया जाएगा।

  

2) कोई लोक प्राधिकारी, उपधारा (1)  में विनिर्दिष्ट छूटों में किसी बात के होते हुए भी, सूचना तक पहुंच को अनुज्ञात कर सकेगा, यदि सूचना के प्रकटन में लोक हित, लोक प्राधिकारी को नुकसान से अधिक है।

3)   उपधारा (1)  के खण्ड (क)  या खण्ड (झ) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी घटना, वृत्तांत या विषय से संबंधित कोई सूचना जो उस तारीख से जिसको धारा 6 के अधीन कोई अनुरोध किया जाता है, 20 वर्ष पूर्व हुई है या होती है, उस धारा के अधीन अनुरोध करने वाले व्यक्ति को उपलब्ध कराई जाएगीः

परंतु यह कि जहां उस तारीख से जिसको 20 वर्ष की उपलब्धि को संगणित किया जाना है,

    उदभुत कोई प्रश्न उत्पन्न होता है, वहां केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा।


टिप्पणी

अधिनीयम कि धारा 8 अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसमें कतिपय ऐसी सूचनाओं का उल्लेख किया गया है जिन्हें प्रकट करने अर्थात उपलब्ध कराने से इन्कार किया जा सकेगा। ऐसी सूचनाएं निम्नलिखित है-

(क) भारत की प्रमुख और अखण्डता, राज्य की सुरक्षा, आर्थिक हित आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पडता हो;

(ख) किसी अपराध का उद्दीपन incitement होता हो;

(ग) जिससे न्यायालय का अवमान (contempt) होता हो;

(घ) जिससे संसद या राज्य विधान मण्डल के विशेषाधिकार भंग होते हो;

(ड) जिससे तीसरे पक्षकार की प्रतियोगी स्थिति को नुकसान होता हो;

(च) वैश्वासिक नातेदारी में उपलब्ध सूचना;

(छ)  विदेशी सरकार से विश्वास में प्राप्त सूचना;

(ज) जिससे व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो जाए;

(झ) जिससे अन्वेषण, अपराधियं की गिरफ्तारी या अभियोजन की क्रीया में अडचन पैदा हो जाए;

(त्र) मंत्रिमण्डल के कागजपत्र, जिसमें मंत्रिपरिषद् के सचिवों और अन्य अधिकारियों के विचार – विमर्श के अभिलेख सम्मिलित है, आदि। 


लेकिन जो सूचनाएं संसद या राज्य विधान मण्डलों को दी सकती हैं, ये किसी व्यक्ति को भी दी ज सकती सकेगी। ऐसी सूचनाएं किसी व्यक्ति को देने से इन्कार नहीं किया जा सकेगा।

फिर लोक प्राधिकारी द्वारा किसी सूचना तक पहुँच को अनुज्ञात किया जा सकेगा, यदि ऐसी सूचना के प्रकटन में लोक प्राधिकारी को होने नुकसान से लोक हित अधिक हो अर्थात सूचनाओं के प्रकटन में लोक हित को अधिक महत्त्व दिया जाएगा।


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 9 में विहीत अनूसार कतिपय मामलों में पहुंच अस्वीकृत करने के आधार कैन से  है ?

उत्तर-

धारा 9. कतिपय मामलों में पहुंच अस्वीकृत करने के आधार

 धारा 8 के उपबन्धों पर प्रतिकुल प्रभाव डाले बिना, कोई यथास्थाति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, सूचना के किसी अनुरोध को अस्वीकार कर सकेगा जहां पहुंच उपलब्ध कराने के ऐसे अनुरोध में राज्य से भिन्न किसी व्यक्ति के विद्यमान प्रतिलिप्यधिकार का उल्लंघन अन्तर्वलित है।

टिप्पणी

   धारा 9  में यह कहा गया है कि किसी ऐसी सूचना के अनुरोध को भी इन्कार /अस्वीकार किया जा सकेगा जिसके प्रकटन से राज्य से भिन्न किसी व्यक्ति के विद्यमान प्रतिलिप्याधिकारों का उल्लंघन होता है।


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 10 में विहीत अनूसार पृथक्करणीयता  का अर्थ क्या है ?

उत्तर-                   धारा 10. पृथक्करणीयता

1) जहां सूचना तक पहुंच के अनुरोध को इस आधार पर अस्वीकार किया जाता है कि यह ऐसी सूचना के संबंध में है जो प्रकट किए जाने से छूट प्राप्त है वहां इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, अभिलेख के उस भाग तक पहुंच अनुदत्त की जा सकेगी जिसमें कोई ऐसी सूचना अन्तर्विष्ट नहीं है, जो इस अधिनियम के अधीन प्रकट किए जाने से छूट प्राप्त है और जो ऐसे भाग से, जिसमें छूट प्रापत सूचना अन्तर्विष्ट है, उचित रूपसे पृथक की जा सकती है।

2) जहां उपधारा  (1) के अधीन अभिलेख के किसी भाग तक पहुंच अनुदत्त की जाता है, वहाँ यथास्थिति केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी निम्नलिखित सूचना देते हुए, आवेदक को एक सूचना देगा-

(क)  अनुरोध किए गए अभिलेख का केवल एक भाग ही, उस अभिलेख से उस सूचना को जो प्रकटन से छूट प्राप्त है पृथक करने के पश्चात उपलब्ध कराया जा रहा है;

(ख) विनिश्चय के कारण जिनके अंतर्गत तथ्य के किसी महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर उस सामग्री का निर्देश देते हुए देश पर वे विनिश्चय आधारित थे कोई निष्कर्ष भी है;

(ग)  विनिश्चय करने वाले व्यक्ति का नाम और पदनाम;

(घ)  उसके द्वारा संगणित फीस के ब्यौरे और फिस की वह रकम जिसकी आवेदक से निक्षेप करने की अपेक्षा है; और

(ड) सूचना के भाग के अप्रकटन के बाबत विनिश्चय के पुनर्विलोकन के संबंध में उसके अधिकार, प्रभारित फिस की रकम या उपलब्ध कराई गई पहुंच का रूप जिसके अन्तर्गत यथास्थिति, धारा 19 की उपधारा (1)  के अधीन विनिर्दीष्ट वरिष्ठ अधिकारी या केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी की विशिष्टियां, समय सीमा, प्रक्रीया और कोई अन्य रूप भी है।

टिप्पणी

 धारा  10 सूचनाओं की पृथक्करणीयता के बारे में प्रावधान करती है। इससे अभिप्राय यह है कि जहां किसी व्यक्ति द्वारा सूचना चाही जाती है जिसका कुछ भाग ऐसा हो जो धारा 8 के अंतर्गत छूट में आता हो अर्थात जो प्रकट नहीं की जा सकती हो, लेकिन, शेष प्रकट की जा सकती हो, वहां ऐसी सूचना तक पहुंच अनुज्ञात कर दी जायेगी बशर्ते कि उन्हें पृथक किया जा सकता हो।

       इस तथ्य से आवेदक को अवगत करा दिया जाएगा। इस धारा का मुख्य उद्देश्य यह है कि किसी व्यक्ति को छूट प्राप्त सूचना के नाम पर अन्य सूचनाओं से वंचित नहीं किया जाए।


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 11 में विहीत अनूसार  तृतीय पक्षकार सूचना का अर्थ  क्या है ?

उत्तर-

धारा 11. तृतीय पक्षकार सूचना

1)  जहां, किसी यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी का, इस अधिनियम के अधीन किए गए अनुरोध पर कोई ऐसी सूचना या अभिलेख या उसके किसी भाग को प्रकट करने का आशय है, जो किसी पर –व्यक्ति से संबंधित है या उसके द्वारा प्रदाय किया गया है उस पर-व्यक्ति द्वारा उसे गोपनीय माना गया है, वहां यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी अनुरोध प्राप्त होने से पांच दिन के भीतर ऐसे पर-व्यक्ति को अनुरोध की और इस तथ्य की लिखित रूप में सूचना देगा कि यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी का उक्त सूचना या अभिलेख या उसके किसी भाग को प्रकट करने का आसय है, और इस बाबत कि सूचना प्रकट की जानी चाहिए या नहीं, लिखित में या मौखिक रूप से निवेदन करने के लिए पर-व्यक्ति को आमंत्रित करेगा तथा सूचना के प्रकटन की बात कोई विनिश्चय करते समय पर-व्यक्ति के ऐसे निवेदन को ध्यान में रखा जाएगाः

परंतु विधि द्वारा संरक्षित व्यापार या वाणिज्यिक गुप्त बातों की दशा में के सिवाय, यदि ऐसे प्रकटन में लोकहित, ऐसे पर-व्यक्ति के हितों की किसी संभावित अपहानि या क्षति से अधिक महत्त्वपूर्ण है तो प्रकटन अनुज्ञात किया जा सकेगा।    

2)  जहां उपधारा (1)  के अधीन यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी द्वारा पर-व्यक्ति पर किसी सूचना या अभिलेख या उसके किसी भाग की बाबत कोई सूचना तामील की जाती है, वहां ऐसे पर-व्यक्ति को, ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से दस दिन के भीतर, प्रस्तावित प्रकटन के विरूद्ध अभ्यावेदन करने का अवसर दिया जाएगा।

3) धारा 7 में किसी बात के होते हुए भी, यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी धारा  6 के अधीन अनुरोध प्राप्त होने के पश्चात चालीस दिन के भीतर, यदि पर –व्यक्ति को उपधारा (2)  के अधीन अभ्यावेदन करने का अवसर दे दिया गया है, तो इस बारे में विनिश्चय करेगा कि उक्त सूचना या अभिलेख या उसके भाग का प्रकटन किया जाए या नहीं और अपने विनिश्चय की सूचना लिखित में पर –व्यक्ति को देगा।

4) उपधारा (3)  के अधीन दी गई सूचना में यह कथन भी सम्मिलित होगा कि वह पर –व्यक्ति ,जिसे सूचना दी गई है, धारा 19 के अधीन उक्त विनिश्चय के विरूद्ध अपील करने का हकदार है।

टिप्पणी

 धारा 11 यह कहती है कि जहां चाही गई सूचना ऐसी हो जो किसी पर-व्यक्ति से संबंधित हो या ऐसे पर-व्यक्ति द्वारा वह प्रदाय की गई हो या वह पर-व्यक्ति ऐसी सूचना को गोपनीय मानता हो, तब केन्द्रीय लेक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी द्वारा इस आशय की लिखित सूचना दी जाएगी कि-

(क)  किसी व्यक्ति द्वारा अमुक सूचना चाही गई है;

(ख)  ऐसी सूचना उस पर-व्यक्ति से संबंधित है या उसके द्वारा प्रदाय की गई है या वह उसे गोपनीय मानता है;

(ग) ऐसी सूचना को चाहे गए व्यक्ति को उपलब्ध कराने का उस अधिकारी का आशय है; वह व्यक्ति सूचित करे कि ऐसी सूचना चाहे गए व्यक्ति को दी जाए या नहीं। पर व्यक्ति इसका जो भी उत्तर देता है उसे ऐसे आवेदन का निपटारा करते समय ध्यान में रखा जाएगा।

     यदि सूचना को प्रकट किया जाना लोक हित में अधिक है और पर –व्यक्ति हो होने वाली हानि अपेक्षाकृत कम है तो ऐसी सूचना के प्रकटन की अनुमति दे दी जाएगी।

    पर-व्यक्ति से सूचना का प्रकटन चाहे जाने पर ऐसा पर-व्यक्ति सूचना की तामील से 10  दिन के भीतर अपना अभ्यावदेन प्रस्तुत कर सकेगा।

 सूचना चाहने वाले व्यक्ति के अनुरोध के पश्चात 40 दिन के भीतर ऐसे अनुरोध पर निर्णय लिया जाना अपेक्षित है कि वांछित सुचना का प्रकटन किया जाए या नहीं

 यदि सूचना का प्रकटन किया जाता है तो पर-व्यक्ति द्वारा ऐसे विनिश्चय के विरूद्ध अपील की जा सकेगी। 


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 12 में केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन कि विहीत प्रक्रिया क्या है? केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन कैसे होगा ?

उत्तर-

केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (1)  केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा केन्द्रीय सूचना आयोग के नाम से ज्ञात एक निकाय का गठन करेगी, जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का पालन करेगा, जो उसे इस अधिनियम के अधीन सौंपे जाएं।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (2) केन्द्रीय सूचना आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-

     (क) केन्द्रीय सूचना आयुक्त; और 

      (ख) दस से अनधिक उतनी संख्या में केन्द्रीय सूचना आयुक्त, तने आवश्यक समझे जाएं।


सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (3) मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा निम्निखित से मिलकर बनी समिति की सिफारिश की जाएगी-

iii. प्रधानमंत्री, जो समिति का अध्यक्ष होगा।

iv. लोकसभा में विपक्ष का नेता; और

v. प्रधानमंत्री द्वारा नाम निर्दिष्ट संध मंत्रिमंडल का एक मंत्री।

स्पष्टीकरण – शंकाओं के निवारण के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां लोक सभा में विपक्ष के नेता को उस रूप में मान्यता नहीं दी गई है, वहां लोक सभा में सरकार के विपक्षी एकल सबसे बडे समूह के नेता को विपक्ष का नेता समझा जाएगा।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (4) केन्द्रीय सूचना आयोग के कार्यों का सादारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबंधन, मुख्य सूचना आयुक्त से निहीत होगा, जिसकी सहायता सूचना आयुक्तों द्वारा की जाएगी और वह ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा, जिनका केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा स्वतंत्र रूप से इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य प्राधिकारी के निदेशों के अधीन रहे बिना प्रयोग किया जा सकता है या जो की जा सकती है।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (5) मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त विधि, विज्ञान ओर प्रौद्यगिकी, समाज सेवा, प्रबंध, पत्रकरिता, जनसंपर्क माध्यम या प्रशासन तथा शासन का व्यापक ज्ञान और अनुभव रखने वाले जनजीवन में प्रख्यात व्यक्ति होंगे।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (6) मुख्य सूचना आयुक्त या कोई सूचना आयुक्त, यथास्थिति, संसद का सदस्य या किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्रों के विधान-मंडल का सदस्य नहीं होगा या कोई अन्य लाभ का पद धारित नहीं करेगा या किसी राजनैतिक दल से संबद्ध नहीं होगा अथवा कोई कारबार नहीं करेगा या कोई वृत्ति नहीं करेगा।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (7) केन्द्रीय सूचना आयोग का मुख्यालय, दिल्ली में होगा और केन्द्रीय सूचना आयोग, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, भारत मेंअन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकेगा।

टिप्पणी

              इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग तथा कृत्यों का निर्वहन करने के लिए धारा 12 में एक केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन का प्रावधान किया गया है। आयोग का गठन शासकीय राजपत्र में अधिसूचना जारी करते हुए केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जाएगा।

गठन- 

   केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन निम्नांकित से मिलकर होगा-

3. मुख्य सूचना आयुक्त एक; तथा

4. केन्द्रीय सूचना आयुक्त (अधिक तम दस)

चयन समिति- 

           मुख्य सूचना आयुक्त तथा केन्द्रीय सूचना उपायक्तों की नियुक्ति हेतु नामों की सिफारिश एक समिति द्वारा की जाएगी, जिसमें निम्नांकित सदसय होंगे-

 (क) प्रधानमंत्री                                          अध्यक्ष

(ख) लोक सभा में विपक्ष का नेता                     सदस्य

(ग)  प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देष्ट केन्द्रीय             सदस्य  

       मंत्रीमण्डल का एक मंत्री

अर्हताएं-

           केन्द्रीय सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्त के पदों पर ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त किया जाएगा जो निम्नांकित का व्यापक ज्ञान एवं अनुभव रखने वाले होँगे-

9) विधि;

10) विज्ञान और प्रौद्योगिकी;

11) समाज सेवा;

12) प्रबंधन;

13) पत्रकारिता;

14) जन माध्यम;

15) प्रशासन; अथवा

16) शासन।

मर्यादाएं-

             उपधारा (6)  के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त-

 (क)  संसद या राज्य विधान मण्डल के सदस्य नहीं होगे;

(ख)  लाभ का कोई अन्य पद धारण नहीं कर सकेंगे;

(ग)  किसी राजनितिक दल से सम्बद्ध नहीं होंगे; अथवा

(घ)  कोई कारबार या वृत्ति नहीं कर सकेंगे।


कार्यालय- 

केन्द्रीय सूचना आयोग का मुख्यालय दिल्ली में होगा। केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से आयोग द्वारा भारत में अन्य स्थानों पर अपने कार्यालय स्थापित किए जा सकेंगे।


प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 12 (2) में विहीत किये गये अनूसार केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन किन से मिलकर बनेगा?

उत्तर-  सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (2) केन्द्रीय सूचना आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-

      (क) केन्द्रीय सूचना आयुक्त; और 

(ख) दस से अनधिक उतनी संख्या में केन्द्रीय सूचना आयुक्त, तने        

      आवश्यक समझे जाएं।


गठन- हेतू टिप्पणी

  सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005  केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन निम्नांकित से मिलकर होगा-

1. मुख्य सूचना आयुक्त एक; तथा

2. केन्द्रीय सूचना आयुक्त (अधिकतम दस) 


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 12 (3) में विहीत किये गये अनूसार मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है?

उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (3) मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा निम्निखित से मिलकर बनी समिति की सिफारिश की जाएगी-

i. प्रधानमंत्री, जो समिति का अध्यक्ष होगा।

ii. लोकसभा में विपक्ष का नेता; और

iii. प्रधानमंत्री द्वारा नाम निर्दिष्ट संध मंत्रिमंडल का एक मंत्री।

स्पष्टीकरण – शंकाओं के निवारण के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां लोक सभा में विपक्ष के नेता को उस रूप में मान्यता नहीं दी गई है, वहां लोक सभा में सरकार के विपक्षी एकल सबसे बडे समूह के नेता को विपक्ष का नेता समझा जाएगा।


चयन समिति- हेतू टिप्पणी

           मुख्य सूचना आयुक्त तथा केन्द्रीय सूचना उपायक्तों की नियुक्ति हेतु नामों की सिफारिश एक समिति द्वारा की जाएगी, जिसमें निम्नांकित सदसय होंगे-

 (क) प्रधानमंत्री                                          अध्यक्ष

(ख) लोक सभा में विपक्ष का नेता                     सदस्य

(ग)  प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देष्ट केन्द्रीय             सदस्य  

       मंत्रीमण्डल का एक मंत्री


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 12 (4) में विहीत किये गये अनूसार केन्द्रीय सूचना आयोग के कार्यों का साधारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबंधन, किसके अधिकार में निहीत होगा?

उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (4) केन्द्रीय सूचना आयोग के कार्यों का सादारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबंधन, मुख्य सूचना आयुक्त से निहीत होगा, जिसकी सहायता सूचना आयुक्तों द्वारा की जाएगी और वह ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा, जिनका केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा स्वतंत्र रूप से इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य प्राधिकारी के निदेशों के अधीन रहे बिना प्रयोग किया जा सकता है या जो की जा सकती है।


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 12 (5) में “विहीत” किये गये अनूसार मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की नियुक्ति हेतू योग्यता क्या है?

उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (5) मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त विधि, विज्ञान ओर प्रौद्यगिकी, समाज सेवा, प्रबंध, पत्रकरिता, जनसंपर्क माध्यम या प्रशासन तथा शासन का व्यापक ज्ञान और अनुभव रखने वाले जनजीवन में प्रख्यात व्यक्ति होंगे।

अर्हताएं- हेतू टिप्पणी

           केन्द्रीय सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्त के पदों पर ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त किया जाएगा जो निम्नांकित का व्यापक ज्ञान एवं अनुभव रखने वाले होँगे-

1) विधि;

2) विज्ञान और प्रौद्योगिकी;

3) समाज सेवा;

4) प्रबंधन;

5) पत्रकारिता;

6) जन माध्यम;

7) प्रशासन; अथवा शासन।


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 12 (6) में “विहीत” किये गये अनूसार मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की नियुक्ति हेतू बाध्यतायें क्या है?

उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (6) मुख्य सूचना आयुक्त या कोई सूचना आयुक्त, यथास्थिति, संसद का सदस्य या किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्रों के विधान-मंडल का सदस्य नहीं होगा या कोई अन्य लाभ का पद धारित नहीं करेगा या किसी राजनैतिक दल से संबद्ध नहीं होगा अथवा कोई कारबार नहीं करेगा या कोई वृत्ति नहीं करेगा।


मर्यादाएं- हेतू टिप्पणी

             उपधारा (6)  के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त-

 (क)  संसद या राज्य विधान मण्डल के सदस्य नहीं होगे;

(ख)  लाभ का कोई अन्य पद धारण नहीं कर सकेंगे;

(ग)  किसी राजनितिक दल से सम्बद्ध नहीं होंगे; अथवा

(घ)  कोई कारबार या वृत्ति नहीं कर सकेंगे।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 12 (7) में “विहीत” किये गये अनूसार केन्द्रीय सूचना आयोग का मुख्यालय व कार्यालय कहाँ होगें ?

उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 12. (7) केन्द्रीय सूचना आयोग का मुख्यालय, दिल्ली में होगा और केन्द्रीय सूचना आयोग, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, भारत में अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकेगा।

कार्यालय- हेतू टिप्पणी

केन्द्रीय सूचना आयोग का मुख्यालय दिल्ली में होगा। केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से आयोग द्वारा भारत में अन्य स्थानों पर अपने कार्यालय स्थापित किए जा सकेंगे।


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