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RTI MCQ SEC 27-31 : टीम अभिव्यक्ति

 प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 27 के अन्तर्गत इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यन्वित करने के लिए नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति  क्या है? 

उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 27 के अन्तर्गत नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति निम्नानुसार-

1) समुचित केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी।

2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किसी विषय के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात-

(क)  धारा 4 की उपधारा (4)  में प्रसारित किए जाने वाले मीडीयम की लागत या मीडीयम का प्रिन्ट लागत मूल्य;

(ख) धारा 6 की उपधारा (1)  के अधीन संदेय फीस;

(ग)  धारा 7 की उपधारा (1) और उपधारा (5)  के अधीन सददेय फीस;

(घ)  धारा 13 और धारा 16 की उपधारा (7)  के अधीन अधिकारियों और कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के निबंधन और शर्ते;

(ड) धारा 16 की उपधारा (10)  के अधीन अपीलों का विनीश्चय करते समय यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया;

(च) कोई अन्य विषय, जो विहीत किए जाने के लिए अपेक्षित हो या विहीत किया जाए।

टिप्पणी

 धारा 27 में केन्द्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्तियों का उल्लेख किया गया है। केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी कर उपधारा (2)  में वर्णित विषयों पर नियम बना सकेगी।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 27 (1) में विहीत किये गये अनुसार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यन्वित करने के लिए राजपत्र में किसके द्वारा नियम बना सकती है?

उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 27 (1) में विहीत किये गये अनुसार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यन्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 27 (2) में विहीत किये गये अनुसार केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी कर कौनसे विषयों पर नियम बना सकती है? 

उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 27 (2) में विहीत किये गये अनुसार 

 उपधारा (2) - विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किसी विषय के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात-

(क)  धारा 4 की उपधारा (4) में प्रसारित किए जाने वाले मीडीयम की लागत या मीडीयम का प्रिन्ट लागत मूल्य;

(ख) धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन संदेय फीस;

(ग)  धारा 7 की उपधारा (1) और उपधारा (5) के अधीन सददेय फीस;

(घ)  धारा 13 और धारा 16 की उपधारा (7) के अधीन अधिकारियों और कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के निबंधन और शर्ते;

(ड) धारा 16 की उपधारा (10) के अधीन अपीलों का विनीश्चय करते समय यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया;

(च) कोई अन्य विषय, जो विहीत किए जाने के लिए अपेक्षित हो या विहीत किया जाए।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 28 में विहीत किये गये अनुसार सक्षम प्राधिकारी की नियम बनाने की शक्तियाँ क्या होंगी?

उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 28 में विहीत किये गये अनुसार सक्षम प्राधिकारी की नियम बनाने की शक्ति निम्नानुसार -

धारा 28.  नियम बनाने की सक्षम प्राधिकारी की शक्ति -

1) सक्षम प्राधिकारी, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगा।

2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किसी विषय के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात-

i. धारा 4 की उपधारा (4)  के अधीन प्रसारित की जाने वाली सामग्रीयों के माध्यम की कीमत या प्वाइंट कीमत लागत;

ii. धारा  7 की उपधारा (1)  के अधीन संदेय फीस; और 

iii. कोई अन्य विषय, जो विहीत किए जाने के लिए अपेक्षित हो या विहीत किया जाए।


टिप्पणी

धारा 28 में लोक प्राधिकारियों की नियम बनाने की शक्तियों का उल्लेख किया गया है। लोक प्राधिकारी राजपत्र में अधिसूचना जारी कर उपधारा (2) में वर्णित विषयों पर नियम बना सकेंगे।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 28  (1)में विहीत किये गये अनुसार सक्षम प्राधिकारी इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यन्वित करने के लिए, किसके द्वारा राजपत्र में नियम बना सकता है? 

उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 28 (1) में विहीत किये गये अनुसार सक्षम प्राधिकारी इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यन्वित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगा।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 28 (2) में विहीत किये गये अनुसार सक्षम प्राधिकारी राजपत्र में अधिसूचना जारी कर कौनसे विषयों पर नियम बना सकते है?

उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 28(2) में विहीत किये गये अनुसार सक्षम प्राधिकारी विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किसी विषय के लिए उपबंध कर सकेंगे, जो निम्नानुसार है-

 i) धारा 4 की उपधारा (4) के अधीन प्रसारित की जाने वाली सामग्रीयों के माध्यम की कीमत या प्वाइंट कीमत लागत;

ii) धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन संदेय फीस; और 

iii) कोई अन्य विषय, जो विहीत किए जाने के लिए अपेक्षित हो या विहीत किया जाए।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 29 के अनुसार इस अधिनियम के अधिन बनाये जाने वाले नियमों को संसद अथवा राज्य विधानमण्डल के समक्ष  रखा जाने की प्रक्रिया क्या है?

उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 29 नियमों का रखा जाना-

  इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक अनुक्रमणिका सत्रों में पूरी हो सकेगी/ समाविष्ट हो सकेगी, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त अनुक्रमिक सत्रों के ठिक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिव्तन करने के लिए सहमत हो जाते है अथवा दोनों सदन सहमत हो जाते हैं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात वह नियम यथास्थिति, केवल ऐसे उपांतरित रूप में ही प्रभावी होगा या निष्प्रभाव हो जाएगा। किन्तु ऐसे परिवर्तन या निष्प्रभाव से उस नियम के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडेगा।


2 इस अधिनियम के अधीन किसी राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम अधिसूचित किए जाने के पश्चात यथाशीघ्र राज्य विधान मंडल के समक्ष रखा जाएगा।


टिप्पणी

धारा 29  के अनुसार इस अधिनियम के अधीन बनाये जाने वाले नियमों को, यथास्थिति, संसद अथवा राज्य विधानमण्डल के समक्ष रखा जाएगा।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 29 (2) के अधीन  किसी राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम अधिसूचित किए जाने के पश्चात यथाशीघ्र किसके समक्ष रखा जायेगा?

उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 29 (2)  के अधीन  किसी राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम अधिसूचित किए जाने के पश्चात यथाशीघ्र राज्य विधानमण्डल के समक्ष रखा जायेगा।

टिप्पणी

धारा 29  के अनुसार इस अधिनियम के अधीन बनाये जाने वाले नियमों को, यथास्थिति, संसद अथवा राज्य विधानमण्डल के समक्ष रखा जाएगा।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 30 में विहीत किये गये अनुसार  कठिनाइयों को दूर करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति क्या है? 

उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 30 में विहीत किये गये अनुसार कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति -

1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध, जो स अधिनियम मे उपबंधों से असंगत न हों, बना सकेगी जो कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक और समींचीन प्रतीत होते हैः

पश्चात नहीं किया जाएगा।

2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।

टिप्पणी

  धारा 30 समर्थकारी उपबंध करती है। इसके अनुसार –इस अधिनियम की क्रियान्विति को सूकर बनाने के लिए तथा कठिनाईयों को दूर करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना जारी करते हुए आदेश पारित किये जा सकेंगे।

  ऐसे आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात दो वर्ष की अवधि तक जारी किये जा सकेंगे, बाद में नहीं।

  ऐसे आदेशों को यथाशीघ्र संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा जायेगा।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 30 (1)में विहीत किये गये अनुसार  कठिनाइयों को दूर करने की केन्द्रीय सरकार के  ऐसे आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से कितने अवधि तक जारी किये जाते है?   

उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 30 (1)में विहीत किये गये अनुसार कठिनाइयों को दूर करने के केन्द्रीय सरकार के  ऐसे आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से  दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात नहीं किये जा सकेंगे। 

टिप्पणी

धारा 30 समर्थकारी उपबंध करती है। इसके अनुसार –इस अधिनियम की क्रियान्विति को सूकर बनाने के लिए तथा कठिनाईयों को दूर करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना जारी करते हुए आदेश पारित किये जा सकेंगे।

ऐसे आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात दो वर्ष की अवधि तक जारी किये जा सकेंगे, बाद में नहीं।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 30  (2)में विहीत किये गये अनुसार  कठिनाइयों को दूर करने की केन्द्रीय सरकार के  किये गये प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात यथाशीघ्र किसके समक्ष रखे जाते है? 

उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 30 (2)में विहीत किये गये अनुसार कठिनाइयों को दूर करने के केन्द्रीय सरकार के  किये गये प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।

टिप्पणी -

      धारा 30 समर्थकारी उपबंध करती है। इसके अनुसार –इस अधिनियम की क्रियान्विति को सूकर बनाने के लिए तथा कठिनाईयों को दूर करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना जारी करते हुए आदेश पारित किये जा सकेंगे।

       ऐसे आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात दो वर्ष की अवधि तक जारी किये जा सकेंगे, बाद में नहीं।

  ऐसे आदेशों को यथाशीघ्र संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा जायेगा।


प्रश्न -सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 31  “निरसन” से क्या अभिप्रेत है?

उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 31 निरसन -

 सूचना स्वातंत्र्य अधिनियम, 2002 (2002 का 5) इसके द्वारा निरसित किया जाता है।

टिप्पणी

    धारा 31 निरसनकारी धारा है। इसके द्वारा सूचना स्वातंत्र्य अधिनियम, 2002 को निरसित कर दिया गया है।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 31 अनुसार कौनसे  अधिनियम को निरसित कर दिया है? 

उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 31 अनुसार सूचना स्वातंत्र्य अधिनियम, 2002 (2002 का 5 , The Freedom of Information Act, 2002) को निरसित किया है।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 27 के अनूसार 1सूचना का अधिकार (फिस एवं लागत का विनियमन) नियम बनाने की शक्तियाँ किसे प्रदान की गई है, व नियम बनाने कि प्रक्रिया क्या है?

उत्तर -1सूचना का अधिकार (फिस एवं लागत का विनियमन) नियम, 2005

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 27 में केन्द्रीय सरकार को नियम बनाने की शक्तियाँ प्रदान की गई है। केन्द्रीय सरकार धारा 27 की उपधारा (2)  में वर्णित विषयों पर शासकीय राजपत्र में अधिसूचना जारी करते हुए नियम बना सकती है। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य अधिनियम के उपबंधों की क्रियान्विती सुनिश्चित करना है।

      इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 27 की उपधारा (2)  के खण्ड (ख)  एवं (ग) में वर्जित विषयों संदेय फिसों के बारे में निम्नांकित नियम बनाये गये है-

 सा. का. नि. ................................. केन्द्रीय सरकार, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (2005 का 22) की धारा 27 की उप धारा (2) के खण्ड (ख)  एवं (ग) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित नियम बनाती है-

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ- 

1)  इन नियमों का संक्षिप्त नाम सूचना का अधिकार (फीस और लागत का विनियमन) नियम, 2005 है।

2) ये राजपत्र में प्रकाशन की तारीख को प्रवृत्त होंगे।

 

2. परिभाषाएँ-   इन नियमों में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

(क) “अधिनियम” से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 अभिप्रेत है;

(ख) “धारा” से उक्त अधिनियम की धारा अभिप्रेत है;

(ग)  अन्य सभी शब्दों और पदों के जो इसमें प्रयुक्त है और परिभाषित नहीं है, वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में है। 

 

3.  धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन सूचना अभिप्राप्त करने के लिए कोई अनुरोध, दस रूपए की आवेदन फिस के साथ होगा, जो समुचित रसीद के विरुद्ध नकद के रूप में या मांग देय ड्राफ्ट या बैंकर चैक के रूप में होंगी, जो लोक प्राधिकरण के लेखा अधिकारी को संदेय होगा।

  

4.   धारा 7 की उपधारा (1)  के अधीन किसी सूचना को उपलब्ध कराने के लिए फीस, निम्नलिखित  दर पर, जो समुचित रसीद के विरुद्ध नकद के रूप में या मांग देय ड्राफ्ट या बैंकर चैक के रुप में होगी जो लोक प्राधिकारी के किसी लेखा अधिकारी को संदेय होगा,प्रभारित की जाएगीः-

(क)  तैयार किए गए या प्रतिलिपि किए गए प्रत्येक (ए- 4 या ए 3आकार) कागज के लिए दो रूपए;

(ख)  बडे आकार के कागज में किसी प्रतिलिपि का वास्तविक प्रभार या लागत कीमत;

(ग)  नमूनों या माडलों के लिए वास्तविक लागत या किमत; और

1[(घ) अभिलेखों के निरीक्षण के लिए, पहले घंटे के लिए कोई फीस नहीं; और वाद का प्रत्येक घंटे के लिए पाँच रूपए की फीस।]

  

5. धारा 7  की उपधारा (5)  के अधीन किसी सूचना को उपलब्ध कराने के लिए फीस, निम्नलिखित दर पर, जो समुचित रसीद के विरुद्ध नकद के रुप में या मांग देय ड्राफ्ट या बैंकर चैक रूप में होगी जो लोक प्राधिकारी के किसी लेखा अधिकारी को संदेय होगा, प्रभारित की जाएगी:-

(क)  डिस्केट या फ्लॉपी में सूचना उपलब्ध कराने के लिए, प्रति डिस्केट या फ्लॉपी, पचास रुपए; और

(ख)  मुद्रित प्ररुप में दी गई सूचना के लिए, ऐसे प्रकाशन के लिए नियत कीमत पर या ऐसे प्रकाशन से उद्धरणों की फोटो प्रति के प्रति पृष्ठ के लिए दो रुपए।


1. भारत का राजपत्र, भाग 2, खण्ड 3, उपखण्ड (i) में दिनांक 1-10-2005 को प्रकाशित.

        1. अधिसूचना क्र. जी. एस. आर. 649 (ई) दिनांक 27 अक्टूबर, 2005 द्वारा खण्ड (घ) को प्रतिस्थापित किया गया; प्रतिस्थापन के पूर्व खण्ड (घ)  इस प्रकार था-


“(घ)  अभिलेखों के निरीक्षण के लिए, पहले घंटे के लिए कोई फीस नहीं; और उसके पश्चात प्रत्येक पन्द्रह मिनट (या उसके भाग)  के लिए पाँच रूपए की फीस।” 


प्रश्न- सूचना का अधिकार (फिस एवं लागत का विनियमन) नियम, 2005 की प्रक्रीया क्या है? 

उत्तर -सूचना का अधिकार (फिस एवं लागत का विनियमन) नियम, 2005 निम्नानुसार-

                   सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 27 में केन्द्रीय सरकार को नियम बनाने की शक्तियाँ प्रदान की गई है। केन्द्रीय सरकार धारा 27 की उपधारा (2)  में वर्णित विषयों पर शासकीय राजपत्र में अधिसूचना जारी करते हुए नियम बना सकती है। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य अधिनियम के उपबंधों की क्रियान्विती सुनिश्चित करना है।

      इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 27 की उपधारा (2)  के खण्ड (ख)  एवं (ग) में वर्जित विषयों संदेय फिसों के बारे में निम्नांकित नियम बनाये गये है-

 सा. का. नि. ................................. केन्द्रीय सरकार, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (2005 का 22) की धारा 27 की उप धारा (2) के खण्ड (ख)  एवं (ग) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित नियम बनाती है-


1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ- 

1)  इन नियमों का संक्षिप्त नाम सूचना का अधिकार (फीस और लागत का विनियमन) नियम, 2005 है।

2) ये राजपत्र में प्रकाशन की तारीख को प्रवृत्त होंगे।

 

2. परिभाषाएँ-   इन नियमों में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

(क) “अधिनियम” से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 अभिप्रेत है;

(ख) “धारा” से उक्त अधिनियम की धारा अभिप्रेत है;

(ग)  अन्य सभी शब्दों और पदों के जो इसमें प्रयुक्त है और परिभाषित नहीं है, वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में है। 

 

 3.  धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन सूचना अभिप्राप्त करने के लिए कोई अनुरोध, दस रूपए की आवेदन फिस के साथ होगा, जो समुचित रसीद के विरुद्ध नकद के रूप में या मांग देय ड्राफ्ट या बैंकर चैक के रूप में होंगी, जो लोक प्राधिकरण के लेखा अधिकारी को संदेय होगा।

  

4.  धारा 7 की उपधारा (1)  के अधीन किसी सूचना को उपलब्ध कराने के लिए फीस, निम्नलिखित  दर पर, जो समुचित रसीद के विरुद्ध नकद के रूप में या मांग देय ड्राफ्ट या बैंकर चैक के रुप में होगी जो लोक प्राधिकारी के किसी लेखा अधिकारी को संदेय होगा,प्रभारित की जाएगीः-

(क)  तैयार किए गए या प्रतिलिपि किए गए प्रत्येक (ए- 4 या ए 3आकार) कागज के लिए दो रूपए;

(ख)  बडे आकार के कागज में किसी प्रतिलिपि का वास्तविक प्रभार या लागत कीमत;

(ग)  नमूनों या माडलों के लिए वास्तविक लागत या किमत; और

1[(घ) अभिलेखों के निरीक्षण के लिए, पहले घंटे के लिए कोई फीस नहीं; और वाद का प्रत्येक घंटे के लिए पाँच रूपए की फीस।]

  

 5.  धारा 7  की उपधारा (5)  के अधीन किसी सूचना को उपलब्ध कराने के लिए फीस, निम्नलिखित दर पर, जो समुचित रसीद के विरुद्ध नकद के रुप में या मांग देय ड्राफ्ट या बैंकर चैक रूप में होगी जो लोक प्राधिकारी के किसी लेखा अधिकारी को संदेय होगा, प्रभारित की जाएगी:-

(क)  डिस्केट या फ्लॉपी में सूचना उपलब्ध कराने के लिए, प्रति डिस्केट या फ्लॉपी, पचास रुपए; और

(ख)  मुद्रित प्ररुप में दी गई सूचना के लिए, ऐसे प्रकाशन के लिए नियत कीमत पर या ऐसे प्रकाशन से उद्धरणों की फोटो प्रति के प्रति पृष्ठ के लिए दो रुपए।

1. भारत का राजपत्र, भाग 2, खण्ड 3, उपखण्ड (i) में दिनांक 1-10-2005 को प्रकाशित.

        1. अधिसूचना क्र. जी. एस. आर. 649 (ई) दिनांक 27 अक्टूबर, 2005 द्वारा खण्ड (घ) को प्रतिस्थापित किया गया; प्रतिस्थापन के पूर्व खण्ड (घ)  इस प्रकार था-


“(घ)  अभिलेखों के निरीक्षण के लिए, पहले घंटे के लिए कोई फीस नहीं; और उसके पश्चात प्रत्येक पन्द्रह मिनट (या उसके भाग)  के लिए पाँच रूपए की फीस।” 


प्रश्न- 1केन्द्रीय सूचना आयोग (अपील प्रक्रिया) नियम, 2005 की प्रक्रिया क्या है? व अपील की अन्तर्वस्तु,व संलग्न योग्य दस्तावेज, अपील निराकरण की प्रक्रिया, आयोग द्वारा नोटिस जारी किया जाना, अपीलार्थी या शिकायतकर्ता की व्यक्तिगत उपस्थिती आयोग का आदेश की प्रक्रीया क्या है?

उत्तर -  1केन्द्रीय सूचना आयोग (अपील प्रक्रिया) नियम, 2005 निम्नानुसार-

              जी. एस. आर. 650 (ई)-  सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 27 की उपधारा (2)  उपखण्ड (ई) एवं(एफ) में प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए

 केन्द्रीय सरकार एतदद्वारा निम्नांकित नियमों का निर्माण करती है-


6. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ- 

1)  इन नियम का संक्षिप्त नाम केन्द्रीय सूचना आयोग (अपील प्रक्रीया) नियम, 2005 है।

2) ये  शासकीय राजपत्र में प्रकाशन की तारीख को प्रवृत्त होंगे।

 

7. परिभाषाएँ-   इन नियमों में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

(क) “अधिनियम” से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 अभिप्रेत है;

(ख) “धारा” से उक्त अधिनियम की धारा अभिप्रेत है;

(ग) “आयोग” से तात्पर्य  केन्द्रीय सूचना आयोग से है; 

 (घ) अन्य सभी शब्दों और पदों के जो इसमें प्रयुक्त है और परिभाषित नहीं है, वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में है। 


8. अपील की अन्तर्वस्तु-

आयोग को प्रस्तुत अपील में निम्नलिखित सूचनायें सम्मिलित होगी, यथा-

i. अपीलार्थी का नाम एवं पता;

ii. केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी का नाम एवं पता जिसके आदेशों के विरुद्ध अपील की जा रही है;

iii. आदेश के विवरण क्रमांक सहित (यदि कोई हो) जिसके विरुद्ध अपील की जा रही है;

iv. संक्षेप में अपील के तथ्य;

v. यदि अपील, समझे गये इंकारी के विरुद्ध हो तो आवेदन पत्र के क्रमांक एवं दिनांक तथा केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी के नाम एवं पता जिसे आवेदन दिया गया था;

vi. प्रार्थना या चाहा गया अनुतोष;

vii. प्रार्थना या अनुतोष के आधार;

viii. प्रार्थी द्वारा सत्यापन; एवं

ix. अन्य सूचना जिसे अपील के निराकरण के लिये आयोग आवश्यक समझे।

9. अपील के साथ संलग्न योग्य दस्तावेज- आयोगको प्रस्तुत की जाने वाली प्रत्येक अपील के साथ निम्नलिखित दस्तावेज संलग्न की जायेगी, यथा-

i. स्वःप्रमाणित आदेश या दस्तावेजों की प्रतिलिपियाँ जिसके विरुद्ध अपील प्रस्तुत की जा रही हो;

ii. प्रार्थी द्वारा अपील में संदर्भित एवं निर्भर किये गये दस्तावेजों की प्रतिलिपियाँ; और

iii.  अपील केसाथ प्रस्तुत द्सावेजों की सूची।

10. अपील निराकरण की प्रक्रिया-  अपील निराकरण के लिये आयोग को यह अधिकार होगा कि-

i. वह संबंधित या हितबद्ध व्यक्ति से मौखिक या शपथ पर या शपथ पत्र पर साक्ष्य सुने;

ii. वह दस्तावेजों, लोक दस्तावेजों या उनके प्रतिलिपियों का अनुशीलन या निरिक्षण करें;

iii. वह प्राधिकृत अधिकारियों के माध्यम से अन्य विवरण या तथ्यों की जाँच करे;

iv. वह केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी, केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी, या ऐसा वरिष्ठ अधिकारी जिसने प्रथम अपील निर्णीत किया हो या ऐसा व्यक्ति जिसके विरुद्ध शिकायत की गई हो, जैसा कि उचित हो, को सुने;

v. वह तृतीय पक्षकार को सुने;

vi. वह केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी, केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी, या ऐसा वरिष्ठ अधिकारी जिसने प्रथम अपील निर्णय किया हो या ऐसा व्यक्ति जिसके विरुद्ध शिकायत की गई हो या तृतीय पक्षकार से शपथ-पत्र पर साक्ष्य ग्रहण करे।


11. आयोग द्वारा नोटिस जारी किया जाना- आयोग द्वारा जारी किया जाने वाला नोटिस निम्नालिखित किसी भी तरीके से जारी किया जा सकता है-

i. पक्षकार द्वारा स्वतः;

ii. आदेशिका वाहक द्वारा हमदस्त (दस्ती);

iii. पंजीकृत डाक द्वारा पावती सहित;

iv. विभाग या कार्यालय प्रमुख के द्वारा।


12. अपीलार्थी या शिकायतकर्ता की व्यक्तिगत उपस्थिति-

1) अपीलार्थी या शिकायतकर्ता जैसी स्थिति हो, को सुनवाई की तिथि की कम से कम स्पष्ट 7 दिन पूर्व सूचना दी जायेगी।

2) अपीलार्थी या शिकायतकर्ता जैसी स्थिति हो, अपने विवेक पर आयोग द्वारा अपील या शिकायत की सुनवाई के समय स्वतः या अपने द्वारा यथाविधि नियुक्त प्रतिनिधि के माध्यम से उपस्थिति होगा या उपस्थित नही होने का विकल्प चुनेगा।

3) जहाँ आयोग की यह सन्तुष्टि हो कि परिस्थितियाँ इस प्रकार विद्यमान है कि जिसमें अपीलार्थी या शिकायतकर्ता को आयोग के समक्ष उपस्थिति होने में रुकावट है तब आयोग अपीलार्थी या शिकायतकर्ता को जैसी स्थिति हो अ॔तिम निर्णय के पूर्व सुनवाई का दुसरा अवसरप्रदान करेगा या अन्य कार्यवाही जैसा कि वह उचित समझे करेगा।

4) अपीलार्थी या शिकायतकर्ता जैसी स्थिति ही अपील बिन्दु प्रस्तुतीकरण हेतु अपील प्रक्रिया में किसी भी व्यक्ति की सहायता ले सकेगा किन्तु ऐसा प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति व्यवसायी नही होगा।

13. आयोग का आदेश-  आयोग का आदेश खुली कार्यवाही में घोषित की जायेगी तथा यह रजिस्ट्रार या आयोग द्वारा इस आशय हेतु प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी द्वारा लिखित एवं यथा प्रमाणित होगी।

1. अधिसूचना क्र. सा. क. नि. 650 (अ) दिनांज 28-10-2005 भारत का राजपत्र भाग 2 खण्ड 3 (i) 28-10-2005 दिनांक 28-10-2005 से प्रभावशील को प्रकाशित।


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छत्तीसगढ़ में भारतमाला परियोजना

छत्तीसगढ़ में भारतमाला परियोजना के तहत रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर के लिए भूमि अधिग्रहण में बड़े पैमाने पर मुआवजा घोटाले का खुलासा हुआ है। इस घोटाले में राजस्व अधिकारियों और भू-माफियाओं की मिलीभगत से सरकारी खजाने को लगभग ₹43 करोड़ का नुकसान हुआ है।( स्त्रोत :  The Rural Press ) घोटाले का तरीका भूमि रिकॉर्ड में हेरफेर : अभनपुर तहसील के नायकबांधा, उरला, भेलवाडीह और टोकनी गांवों में भूमि अधिग्रहण के दौरान, अधिकारियों ने खसरा नंबरों में हेरफेर कर एक ही भूमि को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित कर दिया। इससे 17 असली भू-स्वामियों की भूमि को 97 हिस्सों में बांटकर 80 नए नाम रिकॉर्ड में जोड़ दिए गए ।(स्त्रोत :  हरिभूमि ) मुआवजा राशि में बढ़ोतरी : इस हेरफेर के परिणामस्वरूप, मुआवजा राशि ₹29.5 करोड़ से बढ़कर ₹78 करोड़ हो गई, जिससे ₹43 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान हुआ ।( स्त्रोत :  The Rural Press ) जांच और कार्रवाई शिकायत और जांच : 8 अगस्त 2022 को कृष्ण कुमार साहू और हेमंत देवांगन ने इस घोटाले की शिकायत की। इसके बाद, रायपुर कलेक्टर ने जांच के आदेश दिए, जिसमें घोटाले की प...

लालफीताशाही बनाम सुशासन

भारत में लालफीताशाही (Red Tapeism) एक ऐसी प्रशासनिक प्रणाली को दर्शाती है जिसमें सरकारी कार्य अत्यधिक नियमों, प्रक्रियाओं और दस्तावेज़ीकरण की वजह से धीमी गति से होते हैं। यह शब्द आमतौर पर नकारात्मक अर्थ में प्रयोग होता है और इसके कारण नागरिकों, उद्यमियों और कभी-कभी स्वयं अधिकारियों को भी भारी परेशानी होती है। छत्तीसगढ़ प्रदेश में हाल में कई राष्ट्रीय एजेंसियां भ्रष्टाचार के प्रकरणों में अन्वेषण कर रही है, तथाकथित प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों पर लगातार हो रही कार्यवाहियां यह दर्शाता है कि प्रशासनिक नक्सलवाद कई दशकों से छत्तीसगढ़ के सम्पदा का दोहन विधिविरुद्ध तरीके से प्रशासनिक अधिकारी कर रहें है. लालफीताशाही के प्रमुख लक्षण: ब्यूरोक्रेटिक प्रक्रिया की अधिकता: किसी भी कार्य को करने के लिए अनेक स्तरों पर अनुमति लेनी पड़ती है। निर्णय लेने में विलंब: अधिकारी निर्णय लेने से बचते हैं या अत्यधिक दस्तावेज़ मांगते हैं। दस्तावेज़ों की अधिकता: फॉर्म भरने, प्रमाणपत्र देने, अनुमोदन लेने आदि के लिए कई दस्तावेज़ों की आवश्यकता होती है। अधिकारियों का असहयोग: कई बार सरकारी कर्मचारी नागरिकों को...

कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व

  छत्तीसगढ़ में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के लिए सीएसआर फंडिंग का उद्देश्य निम्नलिखित प्रमुख सामाजिक और विकासात्मक लक्ष्यों की पूर्ति करना है: ✅ 1. सामाजिक विकास और कल्याण: CSR फंडिंग का मुख्य उद्देश्य समाज के कमजोर, वंचित और पिछड़े वर्गों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना है। इसके तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण संबंधी पहल की जाती हैं। ✅ 2. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देना: सरकारी व ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार, स्मार्ट क्लास, छात्रवृत्ति, पुस्तकें और शिक्षण संसाधनों की व्यवस्था की जाती है। ✅ 3. स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार: CSR फंडिंग से ग्रामीण अस्पतालों का आधुनिकीकरण, मोबाइल हेल्थ क्लिनिक, टीकाकरण अभियान, मातृ और शिशु स्वास्थ्य, और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए सहायता दी जाती है। ✅ 4. आजीविका और कौशल विकास: ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण (Skill Development), स्वयं सहायता समूह (SHGs) के सशक्तिकरण, और रोजगारपरक कार्यक्रमों का संचालन किया जाता है। ✅ 5. पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग...