प्रश्न --सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 17 में “विहीत” किये गये अनूसार राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त को हटाये जाने की प्रक्रिया क्या है?
उत्तर-धारा 17 के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त को हटाये जाने की प्रक्रिया निम्नानूसार होगीं –
. (1) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या किसी राज्य सूचना आयुक्त को राज्यपाल के आदेश द्वारा साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर उसके पद से तभी हटाया जाएगा, जब उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा उसे किए गए किसी निर्देश पर जांच के पश्चात यह रिपोर्ट दी हो कि, यथास्थिति, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त को उस आधारपर हटा दिया जाना चाहिए।
(2) राज्यपाल, उस राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त को, जिसके विरूद्ध उपधारा (1) के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश किया गया है, ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट प्राप्त होने पर राज्यपाल द्वारा आदेश पारित किए जाने तक पद से निलंबित कर सकेगा और यदि आवश्यक समझे तो जांच के दौरान कार्यालय में उपस्थिति होने से भी प्रतिषिद्ध कर सकेगा।
(3) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी राज्यपाल किसी बात के होते हुए भी राज्यपाल, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त याकिसी राज्य सूचना आयुक्त को आदेश द्वारा पद से हटा सकेगा, यदि यथास्थिति, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त-
(क) दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है; या
(ख) वह ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध ठहराया गया है, जिसमें राज्यपाल के राय में, नैतिक अधमता अंतर्वतित है; या
(ग) वह अपनी पदावधि के दौरान, अपने पद के कर्तव्यों से परे किसी वैतनिक नियोजन में लगा हुआ है; या
(घ) राज्यपाल की राय में, मानसिक या शारीरिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य है; या
(ड) उसने ऐसे वित्तिय और अन्य हित अर्जित किए है, जिनसे मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पडने की संभावना है।
(4) यदि राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या कोई राज्य सूचना आयुक्त, किसी प्रकार राज्य सरकार द्वारा या उसकी ओर से की गई किसी संविदा या करार से संबद्ध या उसमें हितबद्ध है या किसी निगमित कंपनी के किसी सदस्य के रूप में से अन्यथा और उसके अन्य सदस्यों के साथ सामान्यत: उसके लाभ में या उससे प्रोदभूत होने वाले किसी फायदे या परिलब्धियों में हिस्सा लेता है तो वह उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, कदाचार का दोषी समझा जाएगा।
टिप्पणी
धारा 17 राज्य मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्तों को पद से हटाये जाने के संबंध में है।
आधार-
राज्य मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्त को निम्नांकित आधारों पर राज्यपाल द्वारा पद से हटाया जा सकेगा-
(क) कदाचार; अथवा
(ख) असमर्थता।
जांच-
लेकिन इन आधारों पर पदच्युति केवल तभी की जा सकेगी राज्यपाल द्वारा उच्चतम न्यायालय द्वारा जांच के पश्चात इस आशय की रिपोर्ट दे दी जाये।
निलम्बन-
जब राज्यपाल द्वारा जांच के लिए कोई मामला उच्चतम न्यायालय को निर्देशित किया जाता है, तब ऐसी रिपोर्ट के आने तक राज्यपाल द्वारा सूचना आयुक्त अथवा
राज्य मुख्य सूचना आयुक्त को निलम्बित किया जा सकेगा और आवश्यक होने पर उसे कार्यालय में उपस्थित होने से भी रोका जा सकेगा।
पदच्युति के आधार-
राज्यपालद्वारा निम्नांकित आधारों पर भी राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त
को उसके पद से हटाया जा सकेगा-
1. जब वह नैतिक अधमता के किसी मामले में दोष सिध्द ठहराया गया हो।
2. जब उसने लाभ का कोई पद धारण कर लिया हो अर्थात वह वैतनिक नियोजन में लग गया हो।
3. जब वह दिवालिया न्यायनिर्णित कर दिया गया हो।
4. जब वह शारीरिक या मानसिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य हो गया हो।
5. जब उसने वित्तीय या ऐसे अन्य हित अर्जित कर लिए हो जिससे उसके पदीय कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पडता हो।
कदाचार-
इस धारा के प्रयोजनार्थ निम्नांकित को “कदाचार” माना गया है-
(क) भारत सरकार द्वारा या उसकी ओर से की गई किसी संविदा में हितबद्ध हो जाना;
(ख) किसी निगमित कम्पनी के सदस्य से अन्यथा किसी रूप में और उसके अन्य सदस्यों के साथ संयुक्त रुप से लाभ में हिस्सा प्राप्त करना; आदि।
प्रश्न--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 17 (1) में “विहीत” किये गये अनूसार राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त को राज्यपाल के आदेश द्वारा साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर उसके पद से कब हटाया जाएगा?
उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 17. (1) के अनुसार
. (1) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या किसी राज्य सूचना आयुक्त को राज्यपाल के आदेश द्वारा साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर उसके पद से तभी हटाया जाएगा, जब उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा उसे किए गए किसी निर्देश पर जांच के पश्चात यह रिपोर्ट दी हो कि, यथास्थिति, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त को उस आधारपर हटा दिया जाना चाहिए।
पदच्युति के आधार हेतु टिप्पणी-
राज्य मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्त को निम्नांकित आधारों पर राज्यपाल द्वारा पद से हटाया जा सकेगा-
(क) कदाचार; अथवा
(ख) असमर्थता।
लेकिन इन आधारों पर पदच्युति केवल तभी की जा सकेगी राज्यपाल द्वारा उच्चतम न्यायालय द्वारा जांच के पश्चात इस आशय की रिपोर्ट दे दी जाये।
प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 17 (2) में “विहीत” किये गये अनूसार राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त को, जिसके विरुद्ध उपधारा (1) के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश किया गया है, ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट प्राप्त होने पर राज्यपाल द्वारा आदेश पारित किए जाने तक उसे पद से कौन निलम्बित कर सकेगा?
उत्तर--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 17. (2) के अनुसार
17(2)- राज्यपाल, उस राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त को, जिसके विरूद्ध उपधारा (1) के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश किया गया है, ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट प्राप्त होने पर राज्यपाल द्वारा आदेश पारित किए जाने तक पद से निलंबित कर सकेगा और यदि आवश्यक समझे तो जांच के दौरान कार्यालय में उपस्थिति होने से भी प्रतिषिद्ध कर सकेगा।
निलम्बन हेतु टिप्पणी-
जब राज्यपाल द्वारा जांच के लिए कोई मामला उच्चतम न्यायालय को निर्देशित किया जाता है, तब ऐसी रिपोर्ट के आने तक राज्यपाल द्वारा सूचना आयुक्त अथवा
राज्य मुख्य सूचना आयुक्त को निलम्बित किया जा सकेगा और आवश्यक होने पर उसे कार्यालय में उपस्थित होने से भी रोका जा सकेगा।
प्रश्न--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 17 (3) में “विहीत” किये गये अनूसार उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी राज्यपाल राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त को किस आधार पर पद से हटाने जाने का आदेश कर सकेगा?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 14. (3) के अनुसार
(3) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी राज्यपाल राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या किसी राज्य सूचना आयुक्त को आदेश द्वारा पद से हटा सकेगा, यदि यथास्थिति, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त-
(क) दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है; या
(ख) वह ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध ठहराया गया है, जिसमें राज्यपाल के राय में, नैतिक अधमता अंतर्वतित है; या
(ग) वह अपनी पदावधि के दौरान, अपने पद के कर्तव्यों से परे किसी वैतनिक नियोजन में लगा हुआ है; या
(घ) राज्यपाल की राय में, मानसिक या शारीरिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य है; या
(ड) उसने ऐसे वित्तिय और अन्य हित अर्जित किए है, जिनसे मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पडने की संभावना है।
अन्य आधारों परपदच्युति हेतु टिप्पणी-
राज्यपालद्वारा निम्नांकित आधारों पर भी राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त
को उसके पद से हटाया जा सकेगा-
1. जब वह नैतिक अधमता के किसी मामले में दोष सिध्द ठहराया गया हो।
2. जब उसने लाभ का कोई पद धारण कर लिया हो अर्थात वह वैतनिक नियोजन में लग गया हो।
3. जब वह दिवालिया न्यायनिर्णित कर दिया गया हो।
4. जब वह शारीरिक या मानसिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य हो गया हो।
5. जब उसने वित्तीय या ऐसे अन्य हित अर्जित कर लिए हो जिससे उसके पदीय कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पडता हो।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 17 (4) में “विहीत” किये गये अनूसार राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों को कदाचार का दोषी कब समझा जाता है?
उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा - 17. (4) के अनुसार
(4) यदि राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या कोई राज्य सूचना आयुक्त, किसी प्रकार राज्य सरकार द्वारा या उसकी ओर से की गई किसी संविदा या करार से संबद्ध या उसमें हितबद्ध है या किसी निगमित कंपनी के किसी सदस्य के रूप में से अन्यथा और उसके अन्य सदस्यों के साथ सामान्यत: उसके लाभ में या उससे प्रोदभूत होने वाले किसी फायदे या परिलब्धियों में हिस्सा लेता है तो वह उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, कदाचार का दोषी समझा जाएगा।
कदाचार हेतु टिप्पणी-
इस धारा के प्रयोजनार्थ निम्नांकित को “कदाचार” माना गया है-
(क) भारत सरकार द्वारा या उसकी ओर से की गई किसी संविदा में हितबद्ध हो जाना;
(ख) किसी निगमित कम्पनी के सदस्य से अन्यथा किसी रूप में और उसके अन्य सदस्यों के साथ संयुक्त रुप से लाभ में हिस्सा प्राप्त करना; आदि।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 18 में “विहीत” किये गये अनूसार सूचना आयोग की शक्तियाँ और कृत्य क्या है?
उत्तर--धारा 18 के अनुसार सूचना आयोग की शक्तियाँ और कृत्य निम्नानूसार होगीं –
सूचना आयोगों की शक्तियाँ और कृत्य
18. (1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह निम्नलिखित किसी ऐसे व्यक्ति से शिकायत प्राप्त करे और उसकी जांच करे-
(क) जो, यथास्थिति, किसी केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी को इस कारण से अनुरोध प्रस्तुत करने में असमर्थ रहा है कि इस अधिनियम के अधीन ऐसे अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई है या, यथास्थिति, केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी या राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी ने इस अधिनियम के अधीन सूचना या अपील के लिए धारा 19 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी अथवा ज्येष्ठ अधिकारी या यथास्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग को उसके आवेदन को भेजने के लिए स्विकार करने से इंकार कर दिया है,
(ख) जिसे इस अधिनियम के अधीन अनुरोध की गई कोई जानकारी तक पहुंच के लिए इंकार कर दिया गया है;
(ग) जिसे इस अधिनियम के अधीन विनिर्दिष्ट समय –सीमा के भीतर सूचना के लिए या सूचना तक पहुंच के लिए अनुरोध का उत्तर नहीं दिया गया है;
(घ) जिससे ऐसी फीस की रकम का संदाय करने की अपेक्षा की गई है जो वह अनुचित समझता है;
(ड) जो यह विश्वास करता है कि उसे इस अधिनियम के अधीन अपूर्ण भ्रम में डालने वाली या मिथ्या सूचना दी गई है; और
(च) इस अधिनियम के अधीन अभिलेखों के लिए अनुरोध करने का उन तक पहुंच प्राप्त करने से संबंधित किसी अन्य विषय के संबंध में।
(2) जहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग का यह समाधान हो जाता है कि उस विषय में जांच करने के लिए युक्तियुक्त आधार है, वहां वह उसके संबंध में जांच आरंभ कर सकेगा।
(3) 1908 का 5 - यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग को, इस धारा के अधीन किसी मामले में जांच करते समय वही शक्तियां प्राप्त होंगी, जो निम्नलिखित मामलों के संबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय के निहीत होती है, अर्थात-
(क) किन्हीं व्यक्तियों को समन करना और उन्हें उपस्थित करना तथा शपथ पर मौखिक या लिखित साक्ष्य देने के लिए और दस्तावेज या चीजें पेश करने के लिए उनको विवश करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और निरिक्षण की अपेक्षा करना;
(ग) शपथपत्र पर साक्ष्य को अभिग्रहण करना;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतियां मंगाना;
(ड) साक्षियों या दस्तावेजों की परिक्षा के लिए समन जारी करना; और
(च) कोई अन्य विषय, जो विहीत किया जाए।
(4) यथास्थिति, संसद या राज्य विधान-मंडल के किसी अन्य अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी असंगत बात के होते हुए भी, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग इस अधिनियम के अधीन किसी शिकायत की जांच करने के दौरान, ऐसे किसी अभिलेख की परीक्षा कर सकेगा, जिसे यह अधिनियम लागू होता है और जो लोक प्राधिकारी के नियंत्रण में है और उसके द्वारा ऐसे किसी अभिलेख को किन्ही भी आधारों पर रोका नहीं जाएगा।
टिप्पणी
धारा 18 के उपबंध अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें सूचना आयोग की शक्तियों एवं कर्तव्योँ का उल्लेख किया गया है।
आयोग के कर्तव्य-
उपधारा (1) में आयोग के कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है।
इसके अनुसार केन्द्रीय सूचना आयोग तथा राज्य सूचना आयोग कि यह कर्तव्य है कि वह निम्नांकित व्यक्तियों से शिकायत प्राप्त कर उनकी जाचं करें-
(क) जो केन्द्रीय या राज्य सूचना अधिकारी की नियुक्ति नहीं होने से आवेदन नहीं कर पाया है;
(ख) जिसे अनुरोधित जानकारी तक पहुँचने से इन्कार कर दिया गया है;
(ग) जिसे निर्धारित समयावधि में सूचना तक पहुँचने के लिए अनुरोध का उत्तर नहीं दिया गया है;
(घ) जिसे फीस की अनुचित राशि की मांग की गई है;
(ड) जिसे अधिनियम के अधीन अपूर्ण. भ्रमात्मक अथवा मिथ्या सूचना दी गई है; अथवा
(च) अभिलेखों के लिए अनुरोध करने या उन तक पहुँच प्राप्त करने से संबंधित किसी अन्य विषय के संबंध में।
इस प्रकार उपरोक्त मामलों में आयोग द्वारा आरम्भ की जा सकती है। इसका मुख्य उद्देश्य यही है कि कोई भी व्यक्ति सूचना प्राप्त करने के अधिकार से वंचित नहीं रह जाये।
आयोग की शक्तियाँ-
अपने कर्तव्यों के समुचित निर्वहन के लिए आयोग को वे सारी शक्तियां प्रदान की गई है जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित है, यथा-
(क) किसी व्यक्ति को समन करना तथा शपथ पर उसकी मौखिक या लिखित साक्ष्य लेना;
(ख) किसी व्यक्ति को दस्तावेज या चीजें पेश करने के लिए विवश करना;
(ग) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और निरीक्षण की अपेक्षा करना;
(घ) शपथ पत्र पर साक्ष्य लेना;
(ड) किसी न्यायालय या कार्यालय में कोई लोक अभिलेख या उसकी प्रति मंगाना;
(च) साथियों की परिक्षा के लिए समन जारी करना; तथा
(छ) कोई अन्य विषय जो विहीत किया जावे।
इसी प्रकार जांच के लिए उपरोक्त विषयों के संबंध में आयोग को सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्रदान की गई है
जहां तक किसी पक्षकार से किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण का प्रश्न है, ऐसा आदेश देने से पूर्व यह सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए कि ऐसा दस्तावेज अस्तित्व में है।1
शपथ पर साक्ष्य लेने का प्रावधान है। जहां मुख्य परिक्षा के कथन पत्र के माध्यम से कराये गये हों, वहां साक्षी से प्रति –परिक्षा का अवसर देना अपेक्षित है।
प्रश्न--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 18 (1) में “विहीत” किये गये अनूसार केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग के क्या कर्तव्य है?
उत्तर-धारा 18 (1)के अनुसार केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग के कर्तव्य निम्नानुसार होगा-
18. (1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह निम्नलिखित किसी ऐसे व्यक्ति से शिकायत प्राप्त करे और उसकी जांच करे-
(क) जो, यथास्थिति, किसी केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी को इस कारण से अनुरोध प्रस्तुत करने में असमर्थ रहा है कि इस अधिनियम के अधीन ऐसे अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई है या, यथास्थिति, केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी या राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी ने इस अधिनियम के अधीन सूचना या अपील के लिए धारा 19 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी अथवा ज्येष्ठ अधिकारी या यथास्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग को उसके आवेदन को भेजने के लिए स्विकार करने से इंकार कर दिया है,
(ख) जिसे इस अधिनियम के अधीन अनुरोध की गई कोई जानकारी तक पहुंच के लिए इंकार कर दिया गया है;
(ग) जिसे इस अधिनियम के अधीन विनिर्दिष्ट समय –सीमा के भीतर सूचना के लिए या सूचना तक पहुंच के लिए अनुरोध का उत्तर नहीं दिया गया है;
(घ) जिससे ऐसी फीस की रकम का संदाय करने की अपेक्षा की गई है जो वह अनुचित समझता है;
(ड) जो यह विश्वास करता है कि उसे इस अधिनियम के अधीन अपूर्ण भ्रम में डालने वाली या मिथ्या सूचना दी गई है; और
(च) इस अधिनियम के अधीन अभिलेखों के लिए अनुरोध करने का उन तक पहुंच प्राप्त करने से संबंधित किसी अन्य विषय के संबंध में।
आयोग के कर्तव्य हेतु टिप्पणी-
धारा 18 के उपबंध अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें सूचना आयोग की शक्तियों एवं कर्तव्योँ का उल्लेख किया गया है।
उपधारा (1) में आयोग के कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है।
इसके अनुसार केन्द्रीय सूचना आयोग तथा राज्य सूचना आयोग कि यह कर्तव्य है कि वह निम्नांकित व्यक्तियों से शिकायत प्राप्त कर उनकी जाचं करें-
(क) जो केन्द्रीय या राज्य सूचना अधिकारी की नियुक्ति नहीं होने से आवेदन नहीं कर पाया है;
(ख) जिसे अनुरोधित जानकारी तक पहुँचने से इन्कार कर दिया गया है;
(ग) जिसे निर्धारित समयावधि में सूचना तक पहुँचने के लिए अनुरोध का उत्तर नहीं दिया गया है;
(घ) जिसे फीस की अनुचित राशि की मांग की गई है;
(ड) जिसे अधिनियम के अधीन अपूर्ण. भ्रमात्मक अथवा मिथ्या सूचना दी गई है; अथवा
(च) अभिलेखों के लिए अनुरोध करने या उन तक पहुँच प्राप्त करने से संबंधित किसी अन्य विषय के संबंध में।
इस प्रकार उपरोक्त मामलों में आयोग द्वारा आरम्भ की जा सकती है। इसका मुख्य उद्देश्य यही है कि कोई भी व्यक्ति सूचना प्राप्त करने के अधिकार से वंचित नहीं रह जाये।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 18 (2) में विहीत किये गये अनूसार केन्द्रीय सूचना आयोग किस विषय के सम्बन्ध में जाँच आरंभ कर सकेगा?
उत्तर-उपधारा(2)-- जहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग का यह समाधान हो जाता है कि उस विषय में जांच करने के लिए युक्तियुक्त आधार है, वहां वह उसके संबंध में जांच आरंभ कर सकेगा।
प्रश्न--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 18 (3) में विहीत किये गये अनूसार केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग को किसी मामले में जाँच करते समय कौन- कौनसी शक्तियाँ प्राप्त होंगी?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 18 (3) में “विहीत” किये गये अनूसार केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग को किसी मामले में जाँच करते समय प्राप्त शक्तियाँ निम्नानुसार-
केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग को, इस धारा के अधीन किसी मामले में जांच करते समय वही शक्तियां प्राप्त होंगी, जो निम्नलिखित मामलों के संबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय के निहीत होती है, अर्थात-
(क) किन्हीं व्यक्तियों को समन करना और उन्हें उपस्थित करना तथा शपथ पर मौखिक या लिखित साक्ष्य देने के लिए और दस्तावेज या चीजें पेश करने के लिए उनको विवश करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और निरिक्षण की अपेक्षा करना;
(ग) शपथपत्र पर साक्ष्य को अभिग्रहण करना;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतियां मंगाना;
(ड) साक्षियों या दस्तावेजों की परिक्षा के लिए समन जारी करना; और
(च) कोई अन्य विषय, जो विहीत किया जाए।
आयोग की शक्तियाँ हेतु टिप्पणी-
अपने कर्तव्यों के समुचित निर्वहन के लिए आयोग को वे सारी शक्तियां प्रदान की गई है जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित है, यथा-
(क) किसी व्यक्ति को समन करना तथा शपथ पर उसकी मौखिक या लिखित साक्ष्य लेना;
(ख) किसी व्यक्ति को दस्तावेज या चीजें पेश करने के लिए विवश करना;
(ग) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और निरीक्षण की अपेक्षा करना;
(घ) शपथ पत्र पर साक्ष्य लेना;
(ड) किसी न्यायालय या कार्यालय में कोई लोक अभिलेख या उसकी प्रति मंगाना;
(च) साथियों की परिक्षा के लिए समन जारी करना; तथा
(छ) कोई अन्य विषय जो विहीत किया जावे।
इसी प्रकार जांच के लिए उपरोक्त विषयों के संबंध में आयोग को सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्रदान की गई है।
प्रश्न--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अधीन केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग किसी शिकायत की जाँच करने के दौरान, ऐसे किसी अभिलेख की परिक्षा कर सकेगा,जिसे यह अधिनियम लागू होता है और वह लोक प्राधिकारी के नियंत्रण में है?
उत्तर--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 18 (4) में विहीत किये गये अनूसार -
संसद या राज्य विधान-मंडल के किसी अन्य अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी असंगत बात के होते हुए भी, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग इस अधिनियम के अधीन किसी शिकायत की जांच करने के दौरान, ऐसे किसी अभिलेख की परीक्षा कर सकेगा, जिसे यह अधिनियम लागू होता है और जो लोक प्राधिकारी के नियंत्रण में है और उसके द्वारा ऐसे किसी अभिलेख को किन्ही भी आधारों पर रोका नहीं जाएगा।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 19 में विहीत किये गये अनूसार सूचना आयोग की अपील प्रक्रिया क्या होंगी?
उत्तर-धारा 19 के अनुसार सूचना आयोग अपील प्रक्रिया निम्नानूसार होगीं –
19. (1) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे धारा 7 की उपधारा (1) या उपधारा (3) के खंड (क) में विनिर्दिष्ट समय के भीतर कोई विनिश्चय प्राप्त नहीं हुआ है या जो, यथास्थिति, केन्द्रीय लोकसूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के किसी विनिश्चय से व्यथित है, उस अवधि की समाप्ति से या ऐसे किसी विनिश्चय की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर ऐसे अधिकारी को अपील कर सकेगा, जो प्रत्येक लोक प्राधिकरण में, यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या लोक सूचना अधिकारी की पंक्ति से ज्येष्ठ पंक्ति है:
परंतु ऐसा अधिकारी, तीस दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात अपील को ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय पर अपील फाइल करने में पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था।
(2) जहांअपील धारा 11 के अधीन, यथास्थिति, किसी केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्यलोक सूचना अधिकारी द्वारा, पर व्यक्ति की सूचना प्रकट करने के लिए किए गए किसी आदेश के विरूद्ध की जाती है वहां संबंधित पर व्यक्ति द्वारा अपील, उस आदेश की तारीख से 30 दिन के भीतर की जाएगी।
(3) उपधारा (1) के अधीन विनिश्चय के विरूद्ध दूसरी अपील उस तारीख से जिसको विनिश्चय किया जाना चाहिए था या वास्तव में प्राप्त किया गया था, नब्बे दिन के भीतर केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को होगी;
परंतु यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग नब्बे दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात अपील को ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय पर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था।
(4) यदि यथास्थिति केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्यलोक सूचना अधिकारी का विनिश्चय, जिसके विरूद्ध अपील की गई है, पर व्यक्ति की सूचना से संबंधित है तो यथास्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग उस पर व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देगा।
(5) अपील संबंधी किन्ही कार्यवाहीयों में यह साबित करने का भार कि अनुरोध को अस्वीकार करना न्यायोचित था, यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी पर जिसने अनुरोध से कार किया था, होगा।
(6) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किसी अपील का निपटारा, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से अपील की प्राप्ति के तीस दिन के भीतर या ऐसी विस्तारित अवधि के भीतर जो उसके फाइल किए जाने की तारीख से कुल पेंतालीस दिन से अधिक न हो, किया जाएगा।
(7) आयोग का विनिश्चय आबद्धकर होगा।
(8) अपने विनिश्चय में यथास्थिति केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्यलोक सूचना आयोग को निम्नलिखित शक्ति है-
(क) लोक प्राधिकरण से ऐसे उपाय करने की अपेक्षा करना जो इस अधिनियम के उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो, जिनके अंतर्गत निम्नलिखित भी है-
i. सूचना तक पहुंच उपलब्ध करानि, यदि विशिष्ट प्रारूपमें ऐसा अनुरोध किया गया है;
ii. यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्यलोक सूचना अधिकारी को नियुक्त करना;
iii. कतिपय सूचना या सूचना के प्रवर्गों को प्रकाशित करना;
iv. अभिलेअं के अनुरक्षण, प्रबंध और विनाश से संबंधित अपनी पद्धतियों में आवश्यक परिवर्तन करना;
v. अपने अधिकारीयों के लिए सूचना के अधिकार के संबंध में प्रशिक्षण के उपबंध को बढाना;
vi. धारा 4 की उपधारा (1) के खंड ख के अनुसरण में अपनी एक वार्षिक रिपोर्ट उपलबध कराना;
( ख) लोक प्राधिकारी से शिकायतकर्ता को उसके द्वारा सहन की गई किसी हानि या अन्य नुकसान के लिए प्रतिपूरित करने की अपेक्षा करना;
(ग) इस अधिनियम के अधीन उपबंधित शास्तियों में से कोई शास्ति अधिरोपित करना;
(घ) आवेदन को नामंजूर करना।
9 यथास्थिति केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्यलोक सूचना आयोग शिकायतकर्ता और लोक प्राधिकारी को, अपने विनिश्चय की, जिसके अंतर्गत अपील का कोई अधिकार भी है, सूचना देगा।
10 यथास्थिति केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्यलोक सूचना आयोग अपील का विनिश्चय ऐसी प्रक्रीया के अनुसार करेगा, जो विहित की जाए।
टिप्पणी
धारा 19 अपील के संबंध है। इसमें उपबंधित प्रावधानों के अनुसार निम्नांकित दशाओं में किसी व्यथित व्यक्ति द्वारा अपील की जा सकती है-
(क) जहां ऐसे व्यक्ति को विनिर्दिष्ट समयावधि में सूचना तक पहुंच के बारे में को विनिश्चय प्राप्त नहीं हुआ हो; अथवा
(ख) जहां ऐसा व्यक्ति केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्यलोक सूचना आधिकारी के विनिश्चय से व्यथित हो।
ऐसी अपील अपील 30 दिनों में ऐसे अधिकारी को की जा सकेगी जो लोक सूचना अधिकारी से ज्येष्ठ पंक्ति का है।
उप धारा (3) में द्वितिय अपील का प्रावधान किया गया है। द्वितिय अपील 90 दिनों में यथास्थिति केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्यलोक सूचना आयोग को की जा सकेगी।
इस प्रकार अपील के लिए 30 एवं 90 दिनों की समयावधि निर्धारित है। सामान्यत: विलम्ब का पर्याप्त कारण होने पर ही निर्धारित कालावधि के बाद अपील को ग्रहण किया जा सकेगा।
पर्याप्त कारण-
पर्याप्त कारण प्रत्येक मामले की परिस्थातियों पर निर्भर करता है। सामान्यत: पर्याप्त कारण से अभिप्राय ऐसे कारण से है जो पक्षकार के नियंत्रण से बाहर का हो, जैसे-
(क) स्वंय पक्षकार का बीमार हो जाना;
(ख) पक्षकार के अधिवक्ता का बीमार हो जाना;
(ग) पक्षकार का कारागार में निरूद्ध होना;
(घ) अधिवक्ता द्वारा गलत राय दे दिया जाना;
विलम्ब के पर्याप्त कारण को तार्किक विवेक तथा प्रयोजनात्मक भाव से देखा जाना चाहिए। दोनों पक्षों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर देते हुए ऐसे बिन्दुओं पर विचार किया जाना अपेक्षित है।
निपटारे की अवधि
अपील का निपटारा यथाशक्य 30 दिनों में कर दिया जाना चाहिए। यदि ऐसा संभव नहीं हो सके तो कारण लेखबद्ध करते हुए 45 दिनों में कर दिया जाना चाहिए।
प्रक्रिया एवं विनिश्चय
अपील की सुनवाई की प्रक्रीया वह होगी जो विनिश्चित की जाये तथा आयोग का विनिश्चय आबद्धकर होगा।
आयोग की शक्तियां-
उप धारा (8) में आयोग को निम्नांकित शक्तियां प्रदान की गई है-
1. आयोग अधिनियम की क्रियान्विती सुनिश्चित करने के लिए निम्नांकित कार्य कर सकेगा-
(क) सूचना तक पहुँच उपलब्ध कराना;
(ख) केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी की नियुक्ति करना;
(ग) कतिपय सूचनाएं प्रकाशित करना;
(घ) अभिलेखों के रख-रखाव, विनाश आदि की पद्धतियों में परिवर्तन करना;
(ड) प्रशिक्षण की व्यवस्था में अभिवृद्धि करना;
(च) वार्षिक रिपोर्ट तैयार करना; आदि।
2. शिकायतकर्ता के नुकसान की प्रतिपूर्ति करना।
3. शक्ति अधिरोपित करना।
4. आवेदन नामंजूर करना, आदि।
प्रश्न--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 19(1) के अधीन किस दशाओं में किसी व्यथित व्यक्ति द्वारा अपील की जा सकती है?
उत्तर-धारा 19(1) के अनुसार व्यथित व्यक्ति द्वारा निम्नानुसार दशाओं में अपील की जा सकती है –
19. (1) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे धारा 7 की उपधारा (1) या उपधारा (3) के खंड (क) में विनिर्दिष्ट समय के भीतर कोई विनिश्चय प्राप्त नहीं हुआ है; अथवा
जो, यथास्थिति, केन्द्रीय लोकसूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के किसी विनिश्चय से व्यथित है।
उस अवधि की समाप्ति से या ऐसे किसी विनिश्चय की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर ऐसे अधिकारी को अपील कर सकेगा, जो प्रत्येक लोक प्राधिकरण में, यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या लोक सूचना अधिकारी की पंक्ति से ज्येष्ठ पंक्ति है:
परंतु ऐसा अधिकारी, तीस दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात अपील को ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय पर अपील फाइल करने में पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था।
टिप्पणी
धारा 19 अपील के संबंध है। इसमें उपबंधित प्रावधानों के अनुसार निम्नांकित दशाओं में किसी व्यथित व्यक्ति द्वारा अपील की जा सकती है-
(क) जहां ऐसे व्यक्ति को विनिर्दिष्ट समयावधि में सूचना तक पहुंच के बारे में को विनिश्चय प्राप्त नहीं हुआ हो; अथवा
(ख) जहां ऐसा व्यक्ति केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्यलोक सूचना आधिकारी के विनिश्चय से व्यथित हो।
ऐसी अपील अपील 30 दिनों में ऐसे अधिकारी को की जा सकेगी जो लोक सूचना अधिकारी से ज्येष्ठ पंक्ति का है।
प्रश्न--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 19(1) के अधीन व्यथित व्यक्ति द्वारा विनिश्चय अवधि की समाप्ति से या ऐसे किसी विनिश्चय की प्राप्ति से कितने दिनों के भीतर अपील की जा सकती है?
उत्तर- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 19(1) के अनुसार-
उस अवधि की समाप्ति से या ऐसे किसी विनिश्चय की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर ऐसे अधिकारी को अपील कर सकेगा, जो प्रत्येक लोक प्राधिकरण में, यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या लोक सूचना अधिकारी की पंक्ति से ज्येष्ठ पंक्ति है:
परंतु ऐसा अधिकारी, तीस दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात अपील को ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय पर अपील फाइल करने में पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था।
टिप्पणी
अपील 30 दिनों में ऐसे अधिकारी को की जा सकेगी जो लोक सूचना अधिकारी से ज्येष्ठ पंक्ति का है।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 अनुसार व्यथित व्यक्ति द्वारा द्वितीय अपील की जा सकती है क्या? वह कब और कितने दिनों के भीतर की जा सकती है?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (3) में द्वितीय अपील का प्रावधान किया गया है।
(3) उपधारा (1) के अधीन विनिश्चय के विरूद्ध दूसरी अपील उस तारीख से जिसको विनिश्चय किया जाना चाहिए था या वास्तव में प्राप्त किया गया था, नब्बे दिन के भीतर केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को होगी;
परंतु यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग नब्बे दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात अपील को ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय पर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था।
द्वितीय अपील हेतु टिप्पणी-
उप धारा (3) में द्वितिय अपील का प्रावधान किया गया है। द्वितिय अपील 90 दिनों में यथास्थिति केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्यलोक सूचना आयोग को की जा सकेगी।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 अनुसार केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग अपील की नब्बे दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात अपीलार्थी के दूसरी अपील को ग्रहण कर सकता है क्या? यदि हां तो विलम्ब के पर्याप्त कारण से कौनसे कारण अभिप्रेत है?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (3) के अनुसार
(3) उपधारा (1) के अधीन विनिश्चय के विरूद्ध दूसरी अपील उस तारीख से जिसको विनिश्चय किया जाना चाहिए था या वास्तव में प्राप्त किया गया था, नब्बे दिन के भीतर केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को होगी;
परंतु यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग नब्बे दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात अपील को ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय पर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था।
इस प्रकार अपील के लिए 30 एवं 90 दिनों की समयावधि निर्धारित है। सामान्यत: विलम्ब का पर्याप्त कारण होने पर ही निर्धारित कालावधि के बाद अपील को ग्रहण किया जा सकेगा।
पर्याप्त कारण-
पर्याप्त कारण प्रत्येक मामले की परिस्थातियों पर निर्भर करता है। सामान्यत: पर्याप्त कारण से अभिप्राय ऐसे कारण से है जो पक्षकार के नियंत्रण से बाहर का हो, जैसे-
(क) स्वंय पक्षकार का बीमार हो जाना;
(ख) पक्षकार के अधिवक्ता का बीमार हो जाना;
(ग) पक्षकार का कारागार में निरूद्ध होना;
(घ) अधिवक्ता द्वारा गलत राय दे दिया जाना;
विलम्ब के पर्याप्त कारण को तार्किक विवेक तथा प्रयोजनात्मक भाव से देखा जाना चाहिए। दोनों पक्षों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर देते हुए ऐसे बिन्दुओं पर विचार किया जाना अपेक्षित है।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अनुसार केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग पर –व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देता है क्या?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (4) के अनुसार-
यदि यथास्थिति केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्यलोक सूचना अधिकारी का विनिश्चय, जिसके विरूद्ध अपील की गई है, पर व्यक्ति की सूचना से संबंधित है तो यथास्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग उस पर व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देगा।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (5) के अनुसार अपील सम्बन्धी किन्ही कार्यवाहियों में अनुरोध को अस्वीकार करना न्यायोचित था, यह साबित करने का भार किस अधिकारी पर होता है?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (5) के अनुसार-
अपील संबंधी किन्ही कार्यवाहीयों में यह साबित करने का भार कि अनुरोध को अस्वीकार करना न्यायोचित था, यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी पर जिसने अनुरोध को अस्वीकार किया था, होगा।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (6) के अनुसार कितने दिनों के भीतर अपील का निपटारा किया जाना चाहिए? उसका अवधि कितना है?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (6) के अनुसार-
उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किसी अपील का निपटारा, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से अपील की प्राप्ति के तीस दिन के भीतर या ऐसी विस्तारित अवधि के भीतर जो उसके फाइल किए जाने की तारीख से कुल पेंतालीस दिन से अधिक न हो, किया जाएगा।
निपटारे की अवधि हेतु टिप्पणी-
अपील का निपटारा यथाशक्य 30 दिनों में कर दिया जाना चाहिए। यदि ऐसा संभव नहीं हो सके तो कारण लेखबद्ध करते हुए 45 दिनों में कर दिया जाना चाहिए।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (7) के अनुसार अपील की सुनवाई प्रक्रिया क्या है? और आयोग का विनिश्चय किस प्रकार होगा?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (7) के अनुसार-
अपील की सुनवाई की प्रक्रिया वही होगी जो विनिश्चित की जाए।
तथा आयोग का विनिश्चय आबद्धकर होगा।
प्रक्रिया एवं विनिश्चय हेतु टिप्पणी-
अपील की सुनवाई की प्रक्रीया वह होगी जो विनिश्चित की जाये तथा आयोग का विनिश्चय आबद्धकर होगा।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (8) के अनुसार अपने विनिश्चय में केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को कौनसी शक्तियां प्रदान की गई है?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (8) के अनुसार अपने विनिश्चय में केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग निम्नांकित शक्तियां प्रदान की गई है-
(क) लोक प्राधिकरण से ऐसे उपाय करने की अपेक्षा करना जो इस अधिनियम के उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो, जिनके अंतर्गत निम्नलिखित भी है-
i. सूचना तक पहुंच उपलब्ध करानि, यदि विशिष्ट प्रारूपमें ऐसा अनुरोध किया गया है;
ii. यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्यलोक सूचना अधिकारी को नियुक्त करना;
iii. कतिपय सूचना या सूचना के प्रवर्गों को प्रकाशित करना;
iv. अभिलेअं के अनुरक्षण, प्रबंध और विनाश से संबंधित अपनी पद्धतियों में आवश्यक परिवर्तन करना;
v. अपने अधिकारीयों के लिए सूचना के अधिकार के संबंध में प्रशिक्षण के उपबंध को बढाना;
vi. धारा 4 की उपधारा (1) के खंड ख के अनुसरण में अपनी एक वार्षिक रिपोर्ट उपलबध कराना;
( ख) लोक प्राधिकारी से शिकायतकर्ता को उसके द्वारा सहन की गई किसी हानि या अन्य नुकसान के लिए प्रतिपूरित करने की अपेक्षा करना;
(ग) इस अधिनियम के अधीन उपबंधित शास्तियों में से कोई शास्ति अधिरोपित करना;
(घ) आवेदन को नामंजूर करना।
आयोग की शक्तियां हेतु टिप्पणी-
उप धारा (8) में आयोग को निम्नांकित शक्तियां प्रदान की गई है-
1. आयोग अधिनियम की क्रियान्विती सुनिश्चित करने के लिए निम्नांकित कार्य कर सकेगा-
(क) सूचना तक पहुँच उपलब्ध कराना;
(ख) केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी की नियुक्ति करना;
(ग) कतिपय सूचनाएं प्रकाशित करना;
(घ) अभिलेखों के रख-रखाव, विनाश आदि की पद्धतियों में परिवर्तन करना;
(ड) प्रशिक्षण की व्यवस्था में अभिवृद्धि करना;
(च) वार्षिक रिपोर्ट तैयार करना; आदि।
2. शिकायतकर्ता के नुकसान की प्रतिपूर्ति करना।
3. शक्ति अधिरोपित करना।
4. आवेदन नामंजूर करना, आदि।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (9) के अनुसार केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग अपने विनिश्चय की, जिसके अन्तर्गत अपील का कोई अधिकार भी है, उसकी सूचना किसे देगा?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (9) के अनुसार-
केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग शिकायतकर्ता और लोक प्राधिकारी को, अपने विनिश्चय की, जिसके अंतर्गत अपील का कोई अधिकार भी है, सूचना देगा।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (10) के अनुसार केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग अपने का विनिश्चय किस प्रक्रिया के अनुसार करेगा?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के धारा 19 (10) के अनुसार-
केन्द्रीय लोक सूचना आयोग या राज्यलोक सूचना आयोग अपील का विनिश्चय ऐसी प्रक्रीया के अनुसार करेगा, जो विहित की जाए।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20 में विहीत किये गये अनूसार केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के उपर कि जानेवाली शास्ति प्रक्रिया किस तरह से होती है?
उत्तर-धारा 20 में विहीत किये गये अनूसार केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के उपर कि जानेवाली शास्ति प्रक्रिया निम्नानूसार होगीं –
1. धारा 23 में किसी बात के होते हुए भी, जहाँ किसी शिकायत या अपील का विनिश्चय करते समय, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग की यह राय है कि, यथास्थिति, केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी ने बिना किसी युक्तियुक्त कारण के कोई आवेदन लेने से इंकार किया है या दारा 7 की उपधारा 1 के अधीन सूचना के लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर सूचना नहीं दी है या असदभावपूर्वक सूचना के लिए अनुरोध से इंकार किया है या जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना दी है या ऐसी सूचना नष्ट कर दी है अनुरोध का विषय था सूचना देने में किसी रीति से बाधा डाली है तो वह ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जब तक आवेदन प्राप्त किया जाता है या सूचना दी जाती है, दो सौ पचास रूपए की शास्ति अधिरोपित करेगा, तथापि, ऐसी शास्ति की कुल रकम पच्चीस हजार रूपए से अधिक नहीं होगी:
परंतु यथास्थिति केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी को उस पर कोई शास्ति अधिरोपित किए जाने के पूर्व सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा:
परंतु यह और कि यह साबित करने का भार कि उसने युक्तियुक्त रूप से और तत्परतापूर्वक कार्य किया है, यथास्थिति, केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना प्राधिकारी पर होगा।
2. जहाँ किसी शिकायत या अपील का विनिश्चय करते समय, यथास्थिति, केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग की यह राय है कि, यथास्थिति, केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी, बिना किसी युक्तियुक्त कारण के, और लगातार सूचना के लिए कोई आवेदन प्राप्त करने में असफल रहा है या दारा 7 की उपधारा 1 के धीन विनिर्दिष्ट समय के भीतर सूचना नहीं दी है या असदभावपूर्वक सूचना के लिए अनुरोध से इंकार किया गया है या जानबुझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना दी है या ऐसी सूचना नष्ट की है, जो अनुरोध का विषय थी या सूचना देने में किसी भी रीति से बाधा डाली है वहाँ वह यथास्थिति, केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी के विरूद्ध उसे लागू सेवा नियमों केअधीन अनुशासनिक कार्यवाही के लिए सिफारिश करेगा।
केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के शास्ति प्रक्रिया हेतु टिप्पणी
धारा 20 शक्तियों के बारे में है।इसमें केन्द्रीय सूचना आयोग की शक्ति अधिरोपित करने की शक्तियों का उल्लेख किया गया है। जहाँ केन्द्रीय सूचना आयोग की यह राय हो कि किसी केन्द्रीय या राज्य सूचना अधिकारी द्वारा-
(क) बिना युक्तियुक्त कारण के कोई आवेदन लेने से इन्कार कर दिया गया है; या
(ख) निर्धारित समयावधि में कोई सूचना नहीं दी गई है; या
(ग) असदभावनापूर्वक किसी सूचना के अनुरोध से इन्कार कर दिया गया है; या
(घ) जानबुझकर गलत, भ्रामक या अपूर्ण सूचना दी गई हो; या
(ड) वांछित सूचना को नष्ट कर दिया गया है; या
(च) सूचना देने में किसी प्रकार की बाधा डाली गई है;
तब ऐसे अधिकारी पर, प्रत्येक दिन के लिए जब तक ऐसी सूचना नहीं दे दी जाती, 250/- रूपये की शास्ति अधिरोपित की जा सकेगी, लेकिन ऐसी शास्ति 25, 000/- रूपये से अधिक की नहीं हो सकेगी।
ऐसी शास्ति अधिरोपित करने से पूर्व संबंधित अधिकारी को सुनवाई का पर्याप्त अवसर प्रदान किया जायेगा।
यदि सूचना अधिकारी द्वारा बचाव में यह कहा जाता है कि उसके द्वारा युक्तियुक्त रूप से तथा तत्परतापूर्वक कार्य किया गया था, तब इसे साबित करने का भार उसी पर होगा।
आयोग द्वारा ऐसे अधिकारी के विरूद्ध सेवा नियमों के अन्तर्गत अनुशासनात्मक कार्यवाही करने की सिफारिश भी की जा सकेगी।
प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20 में विहीत किये गये अनूसार जँहा किसी शिकायत या अपील का विनिश्चय करते समय,यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना आयोग की राय में , केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी ने बिना किसी युक्तियुक्त कारण के कोई आवेदन लेने से इंकार किया है या धारा 7 की उपधारा 1 के अधीन सूचना के लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर सूचना नहीं दी है या असदभावपूर्वक सूचना के लिए अनुरोध से इंकार किया है या जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना दी है या ऐसी सूचना नष्ट कर दी है अनुरोध का विषय था सूचना देने में किसी रीति से बाधा डाली है तो वह ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जब तक आवेदन प्राप्त किया जाता है या सूचना दी जाती है, तब तक कितने रूपए की शास्ति अधिरोपित करेगा, तथापि, ऐसी शास्ति की कुल अधिकत्तम रकम कितनी होती है?
उत्तर--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20 (1)में विहीत किये गये अनूसार केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के उपर कि जानेवाली शास्ति रकम निम्नानूसार होगीं –
1. धारा 20 में किसी बात के होते हुए भी, जहाँ किसी शिकायत या अपील का विनिश्चय करते समय, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग की यह राय है कि, यथास्थिति, केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी ने बिना किसी युक्तियुक्त कारण के कोई आवेदन लेने से इंकार किया है या दारा 7 की उपधारा 1 के अधीन सूचना के लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर सूचना नहीं दी है या असदभावपूर्वक सूचना के लिए अनुरोध से इंकार किया है या जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना दी है या ऐसी सूचना नष्ट कर दी है अनुरोध का विषय था सूचना देने में किसी रीति से बाधा डाली है तो वह ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जब तक आवेदन प्राप्त किया जाता है या सूचना दी जाती है, दो सौ पचास रूपए की शास्ति अधिरोपित करेगा, तथापि, ऐसी शास्ति की कुल रकम पच्चीस हजार रूपए से अधिक नहीं होगी:
शास्ति रकम हेतु टिप्पणी-
तब ऐसे अधिकारी पर, प्रत्येक दिन के लिए जब तक ऐसी सूचना नहीं दे दी जाती, 250/- रूपये की शास्ति अधिरोपित की जा सकेगी, लेकिन ऐसी शास्ति 25, 000/- रूपये से अधिक की नहीं हो सकेगी।
ऐसी शास्ति अधिरोपित करने से पूर्व संबंधित अधिकारी को सुनवाई का पर्याप्त अवसर प्रदान किया जायेगा।
प्रश्न--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20 (1)में “विहीत” किये गये अनूसार ,केन्द्रीय लोक सूचना आयोग ,केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी पर कब शास्ति अधिरोपित करेगा? शास्ति अधिरोपित किए जाने के पूर्व केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिया जाता है क्या?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20 (1)में “विहीत” किये गये अनूसार केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के उपर निम्न कारणानूसार शास्ति अधिरोपित करेगा –
1. धारा 23 में किसी बात के होते हुए भी, जहाँ किसी शिकायत या अपील का विनिश्चय करते समय, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग की यह राय है कि, यथास्थिति, केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी ने बिना किसी युक्तियुक्त कारण के कोई आवेदन लेने से इंकार किया है या दारा 7 की उपधारा 1 के अधीन सूचना के लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर सूचना नहीं दी है या असदभावपूर्वक सूचना के लिए अनुरोध से इंकार किया है या जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना दी है या ऐसी सूचना नष्ट कर दी है अनुरोध का विषय था सूचना देने में किसी रीति से बाधा डाली है तो वह ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जब तक आवेदन प्राप्त किया जाता है या सूचना दी जाती है, दो सौ पचास रूपए की शास्ति अधिरोपित करेगा, तथापि, ऐसी शास्ति की कुल रकम पच्चीस हजार रूपए से अधिक नहीं होगी:
परंतु यथास्थिति केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी को उस पर कोई शास्ति अधिरोपित किए जाने के पूर्व सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा:
परंतु यह और कि यह साबित करने का भार कि उसने युक्तियुक्त रूप से और तत्परतापूर्वक कार्य किया है, यथास्थिति, केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना प्राधिकारी पर होगा।
केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के शास्ति प्रक्रिया हेतु टिप्पणी
धारा 20 शक्तियों के बारे में है।इसमें केन्द्रीय सूचना आयोग की शक्ति अधिरोपित करने की शक्तियों का उल्लेख किया गया है। जहाँ केन्द्रीय सूचना आयोग की यह राय हो कि किसी केन्द्रीय या राज्य सूचना अधिकारी द्वारा-
(क) बिना युक्तियुक्त कारण के कोई आवेदन लेने से इन्कार कर दिया गया है; या
(ख) निर्धारित समयावधि में कोई सूचना नहीं दी गई है; या
(ग) असदभावनापूर्वक किसी सूचना के अनुरोध से इन्कार कर दिया गया है; या
(घ) जानबुझकर गलत, भ्रामक या अपूर्ण सूचना दी गई हो; या
(ड) वांछित सूचना को नष्ट कर दिया गया है; या
(च) सूचना देने में किसी प्रकार की बाधा डाली गई है;
तब ऐसे अधिकारी पर, प्रत्येक दिन के लिए जब तक ऐसी सूचना नहीं दे दी जाती, 250/- रूपये की शास्ति अधिरोपित की जा सकेगी, लेकिन ऐसी शास्ति 25, 000/- रूपये से अधिक की नहीं हो सकेगी।
ऐसी शास्ति अधिरोपित करने से पूर्व संबंधित अधिकारी को सुनवाई का पर्याप्त अवसर प्रदान किया जायेगा।
यदि सूचना अधिकारी द्वारा बचाव में यह कहा जाता है कि उसके द्वारा युक्तियुक्त रूप से तथा तत्परतापूर्वक कार्य किया गया था, तब इसे साबित करने का भार उसी पर होगा।
प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20 (2)में विहीत किये गये अनूसार ,केन्द्रीय लोक सूचना आयोग ,केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध उसे लागू सेवा नियमों के अधीन अनुशासनिक कार्रवाई के लिए सिफारिश करने की शक्ति रखता है क्या? यदि हां तो कब?
उत्तर-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20 (2)में विहीत किये गये अनूसार केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी पर निम्न कारणानूसार अनुशासनिक कार्रवाई करने की शक्ति रखता है
जहाँ किसी शिकायत या अपील का विनिश्चय करते समय, यथास्थिति, केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग की यह राय है कि, यथास्थिति, केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी, बिना किसी युक्तियुक्त कारण के, और लगातार सूचना के लिए कोई आवेदन प्राप्त करने में असफल रहा है या दारा 7 की उपधारा 1 के धीन विनिर्दिष्ट समय के भीतर सूचना नहीं दी है या असदभावपूर्वक सूचना के लिए अनुरोध से इंकार किया गया है या जानबुझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना दी है या ऐसी सूचना नष्ट की है, जो अनुरोध का विषय थी या सूचना देने में किसी भी रीति से बाधा डाली है वहाँ वह यथास्थिति, केन्द्रीय अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी के विरूद्ध उसे लागू सेवा नियमों के अधीन अनुशासनिक कार्यवाही के लिए सिफारिश करेगा।
केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के शास्ति प्रक्रिया हेतु टिप्पणी-
आयोग द्वारा ऐसे अधिकारी के विरूद्ध सेवा नियमों के अन्तर्गत अनुशासनात्मक कार्यवाही करने की सिफारिश भी की जा सकेगी।
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