Skip to main content

RTI MCQ SEC 1-3 : टीम अभिव्यक्ति

 प्रश्न- भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कब लागू हुआ व प्राधिकार से प्रकाशित कब हूआ?

उत्तर-

भारत का राजपत्र

असाधरण

EXTRAORDINARY

भाग II खण्ड I

PART II- SECTION I

प्राधिकार से प्रकाशित

PUBLISHED BY AUTHORITY

नई दिल्ली, मंगलवार, जून 21, 2005 /ज्येष्ठा 31, 1927             


सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005

(2005 का अधिनियम संख्यांक 22)

(15 जून 2005)

प्रत्येक लोक प्राधिकारी के कार्यकरण में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के संवर्धन के लिए, लोक प्राधिकारियों के नियंत्रणाधीन सूचना तक पहुंच सूनिश्चित करने के लिए नागरिकों के सूचना के अधिकार की व्यावहारिक शासन पद्धति स्थापित करने, एक केन्द्रीय सूचना आयोग तथा राज्य सूचना आयोग का गठन करने और उनसे स॔बंधित या उनसे आनुषंगिक विषयों का उपबंध करने के लिए अधिनियम भारत के संविधान ने लोक तंत्रात्मक गनराज्य की स्थापना की है;

    और लोकतंत्र शिक्षित नागरिक वर्ग तथा ऐसी सूचना की पारदर्शिता की अपेक्षा करता है, जो उसके कार्यकरण तथा भ्रष्टाचार को रोकने के लिए भी और सरकारों तथा उनके परिकरणों को शासन के प्रति उत्तरदायी बनाने के लिए अनिवार्य है;

     और वास्तविक व्यवहार में सूचना के प्रकटन से संभवत: अन्य लोक हितों, जिनके अंतर्गत सरकारों के दक्ष प्रचालन, समिती राज्य वित्तिय संसाधनों के अधिकतम उपयोग और संवेदनशील सूचना की गोपनीयता को बनाए रखना भी है, के साथ विरोध हो सकता है;

      अत: अब यह समीचीन है ऐसे नागरिकों को, कतिपय सूचना देने के लिए, जो उसे पाने के इच्छुक है, उपब॔ध किया जाए;

भारत गणराज्य के छप्पनवे वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप से यह अधिनियम हो:


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 धारा २ (क)  में  “समुचित सरकार’ की परिभाषा क्या है? इसमें क्था –क्या सम्मलित किया गया है?

उत्तर - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (क) में “समुचित सरकार’ को परिभाषीत किया गया है।

धारा २ परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

(क) “समुचित सरकार’ से किसी ऐसे लोक प्राधिकरण के संबंध मे जो-

(i)  केन्द्रीय सरकार या संघ राज्यक्षेत्र द्वारा स्थापित, गठित, उसके स्वामित्वाधीन, नियंत्राणाधीन या उसके द्वारा प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्भ कराई गई निधियों द्वारा पूर्णतया वित्तपोषित किया जाता है, केन्द्रीय सरकार अभिप्रेत है;

(ii) राज्य सरकार द्वारा स्थापित गठित, उसके स्वामित्वाधीन, नियंत्राणाधीन या उसके द्वारा प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्भ कराई गई निधियों द्वारा पूर्णतया वित्तपोषित किया जाता है, केन्द्रीय सरकार अभिप्रेत है;



प्रश्न--सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा २ (ख)  मे “ केन्द्रीय सूचना आयोग”  कि परिभाषा क्या है ? इसमें केन्द्रीय सूचना आयोग से क्या अभिप्रेत है;?

उत्तर - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (क) में “ केन्द्रीय सूचना आयोग”  को परिभाषीत किया गया है।

धारा २ परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

(ख) “ केन्द्रीय सूचना आयोग” से धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन गठित  केन्द्रीय सूचना आयोग अभिप्रेत है;

केन्द्रीय सूचना आयोग

केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन

 12. (1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा केन्द्रीय सूचना आयोग के नाम से ज्ञात एक निकाय का गठन करेगी, जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का पालन करेगा, जो उसे इस अधिनियम के अधीन सौंपे जाएं।


(2) केन्द्रीय सूचना आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-

     (क) केन्द्रीय सूचना आयुक्त; और 

      (ख) दस से अनधिक उतनी संख्या में केन्द्रीय सूचना आयुक्त, तने आवश्यक समझे जाएं।


(3) मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा निम्निखित से मिलकर बनी समिति की सिफारिश की जाएगी-

i. प्रधानमंत्री, जो समिति का अध्यक्ष होगा।

ii. लोकसभा में विपक्ष का नेता; और

iii. प्रधानमंत्री द्वारा नाम निर्दिष्ट संध मंत्रिमंडल का एक मंत्री।

स्पष्टीकरण – शंकाओं के निवारण के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां लोक सभा में विपक्ष के नेता को उस रूप में मान्यता नहीं दी गई है, वहां लोक सभा में सरकार के विपक्षी एकल सबसे बडे समूह के नेता को विपक्ष का नेता समझा जाएगा।


(4) केन्द्रीय सूचना आयोग के कार्यों का सादारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबंधन, मुख्य सूचना आयुक्त से निहीत होगा, जिसकी सहायता सूचना आयुक्तों द्वारा की जाएगी और वह ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा, जिनका केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा स्वतंत्र रूप से इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य प्राधिकारी के निदेशों के अधीन रहे बिना प्रयोग किया जा सकता है या जो की जा सकती है।


(5) मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त विधि, विज्ञान ओर प्रौद्यगिकी, समाज सेवा, प्रबंध, पत्रकरिता, जनसंपर्क माध्यम या प्रशासन तथा शासन का व्यापक ज्ञान और अनुभव रखने वाले जनजीवन में प्रख्यात व्यक्ति होंगे।


(6) मुख्य सूचना आयुक्त या कोई सूचना आयुक्त, यथास्थिति, संसद का सदस्य या किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्रों के विधान-मंडल का सदस्य नहीं होगा या कोई अन्य लाभ का पद धारित नहीं करेगा या किसी राजनैतिक दल से संबद्ध नहीं होगा अथवा कोई कारबार नहीं करेगा या कोई वृत्ति नहीं करेगा।


(7) केन्द्रीय सूचना आयोग का मुख्यालय, दिल्ली में होगा और केन्द्रीय सूचना आयोग, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, भारत मेंअन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकेगा।

टिप्पणी

              इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग तथा कृत्यों का निर्वहन करने के लिए धारा 12 में एक केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन का प्रावधान किया गया है। आयोग का गठन शासकीय राजपत्र में अधिसूचना जारी करते हुए केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जाएगा।

गठन- 

   केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन निम्नांकित से मिलकर होगा-

1. मुख्य सूचना आयुक्त एक; तथा

2. केन्द्रीय सूचना आयुक्त (अधिक तम दस)

चयन समिति- 

           मुख्य सूचना आयुक्त तथा केन्द्रीय सूचना उपायक्तों की नियुक्ति हेतु नामों की सिफारिश एक समिति द्वारा की जाएगी, जिसमें निम्नांकित सदसय होंगे-

 (क) प्रधानमंत्री                                          अध्यक्ष

(ख) लोक सभा में विपक्ष का नेता                     सदस्य

(ग)  प्रधानमंत्री द्वारा नामनिर्देष्ट केन्द्रीय             सदस्य  

       मंत्रीमण्डल का एक मंत्री


अर्हताएं-

           केन्द्रीय सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्त के पदों पर ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त किया जाएगा जो निम्नांकित का व्यापक ज्ञान एवं अनुभव रखने वाले होँगे-

1) विधि;

2) विज्ञान और प्रौद्योगिकी;

3) समाज सेवा;

4) प्रबंधन;

5) पत्रकारिता;

6) जन माध्यम;

7) प्रशासन; अथवा

8) शासन।

मर्यादाएं-

             उपधारा (6)  के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त-

 (क)  संसद या राज्य विधान मण्डल के सदस्य नहीं होगे;

(ख)  लाभ का कोई अन्य पद धारण नहीं कर सकेंगे;

(ग)  किसी राजनितिक दल से सम्बद्ध नहीं होंगे; अथवा

(घ)  कोई कारबार या वृत्ति नहीं कर सकेंगे।


कार्यालय- 

केन्द्रीय सूचना आयोग का मुख्यालय दिल्ली में होगा। केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से आयोग द्वारा भारत में अन्य स्थानों पर अपने कार्यालय स्थापित किए जा सकेंगे ।


(ग) “ केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी” से उपधारा (1) के अधीन पदाभिहित केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत धारा 5  की उपधारा (2)  के अधीन इस प्रकार पदाभिहित कोई केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी भी है;


(घ) “ मुख्य सूचना आयुक्त” और “सूचना आयुक्त” से धारा 12 की उपधारा (3)  के अधीन नियुक्त मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त अभिप्रेत है;


(ड) “ सक्षम अधिकारी’ से अभिप्रेत है-

         (i)  लोक सभा या किसी राज्य की विधान सभा की या किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र की, जिसमें ऐसी      

            सभा है, दशा में अधयक्ष और राज्य सभा या किसी राज्य की विधान परिषद की दशा में सभापति;


(ii) उच्चतम न्यायालय की दसा में भारत का मुख्य न्यायमूर्ति;

(iii)  किसी उच्च न्यायालय की दशा में उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति;

(iv)  संविधान द्वारा या उसके अधीन स्थापित या गठित अन्य प्राधिकरणों की दशा में, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल;

(v) संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीमन नियुक्त प्रशासक;


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में धारा २ (च) “सूचना”  की परिभाषा क्या है? इसमें “सूचना” से क्या अभिप्रेत है?

उत्तर - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (च) में “सूचना”   को परिभाषीत किया गया है।

धारा २ परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

धारा २ (च)         

 “सूचना” कि परिभाषा  

किसी इलैक्ट्रानिक रूप से धारित अभिलेख, 

दस्तावेज,

ज्ञापन,

ई-मेल,

मत,

सलाह,

प्रेस विज्ञप्ति,

परिपत्र,

आदेश,

लागबुक,

संविदा,

रिपोर्ट,

कागज पत्र,

नमूने माडल,

आंकडो संबंधी सामग्री

और किसी प्राइवेट निकाय से संबंधित ऐसी सूचना सहित, जिस तक तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधी के अधीन किसी लोक प्राधिकारी की पहुंच हो सकती है, किसी रूप में कोई सामग्री अभिप्रेत है।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 मे धारा २ (छ) के अनूसार “ विहीत”   कि परिभाषा क्या है? इसमें “ विहीत”  से क्या अभिप्रेत है?

उत्तर - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (छ)  में “ विहीत”  को परिभाषीत किया गया है।

धारा २ परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

धारा २ (छ)   “ विहीत” से यथास्थिती, समुचित सरकार या सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है।



प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 मे धारा २ (ज) में “ लोक प्राधिकारी” कि परिभाषा क्या है? इसमें “ लोक प्राधिकारी”   से क्या अभिप्रेत है?

उत्तर - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (ज)  में “ लोक प्राधिकारी”  को परिभाषीत किया गया है।

धारा २ परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

धारा २ (ज) “ लोक प्राधिकारी” से,

        (क) संविधान द्वारा या उसके अधीन;

(ख) संसद द्वारा बनाई गई किसी अन्य विधि द्वारा;

(ग) राज्य विधान – मंडल द्वारा बनाई गई किसी अन्य विधि द्वारा:

(ध)  समुचित सरकार द्वारा जारी की गई अधिसूचना या किए गए आदेश द्वारा स्थापित या गठित कोई प्राधिकारी या निकाय या स्वायत्त सरकारी संस्था अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत-


(i) कोई ऐसा निकाय है जो केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या उसके द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा वित्त पोषित है;

(ii) कोई ऐसा गैर-सरकारी संगठन है जो समुचित सरकार द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा वित्तपोषित है।


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 मे धारा २ (झ) में अभिलेख कि परिभाषा क्या है ? इसमें  अभिलेख  से क्या अभिप्रेत है ?

उत्तर - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (झ) में अभिलेख को परिभाषीत किया गया है।

धारा २ परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

धारा २  (झ)  अभिलेख में निम्नलिखित सम्मिलित है-

(क) कोई दस्तावेज, पाण्डुलिपि और फाइल;

(ख) किसी दस्तावेज की कोई माइक्रोफिल्म, माइक्रोफिशे और प्रतिकृति प्रति;

(ग)  ऐसी माइक्रोफिल्म में सन्निविष्ट प्रतिबिम्ब का पुनरूत्पादन और

(घ) किसी कम्प्युटर द्वारा या किसी अन्य युक्ति द्वारा उत्पादित कोई अन्य सामग्री।


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 मे धारा २ (त्र) के अनूसार  “सूचना का अधिकार”  कि परिभाषा क्या है? इसमें  धारा २ (त्र)  “सूचना का अधिकार” से क्या अभिप्रेत है?

उत्तर - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (त्र) में “सूचना का अधिकार” को परिभाषीत किया गया है।

धारा २ परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

धारा २ (त्र)  “सूचना का अधिकार” से इस अधिनियम के अधीन पहुंच योग्य सूचना का, जो किसी लोक प्राधिकारी द्वारा या उसके नियंत्रणाधीन धारित है, अधिकार अभिप्रेत है और जिसमें निम्नलिखित का अधिकार सम्मिलित है-

(i) कृति, दस्तावेजों, अभिलेखों का निरीक्षण;

(ii) दस्तावेजों या अभिलेखों के टिप्पण, उद्धरण या प्रमाणित लेना;

(iii) सामग्री के प्रमाणित नमुने लेना;

(IV) डिस्केट, फ्लापी, टेप, वीडीयो कैसेट के रूप में या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक रिति में या प्रिंटआउट के माधयम से सूचना को, जहां ऐसी सूचना किसी कम्प्युटर या किसी अन्य युक्ति में भण्डारित है, अभिप्राप्त करना।


प्रश्न- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा २ (ट) के अनूसार “ राज्य सूचना आयोग”  कि परिभाषा क्या है? इसमें  धारा २ (ट)  “ राज्य सूचना आयोग ”   से क्या अभिप्रेत है?

उत्तर - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (ट) “राज्य सूचना आयोग”  को परिभाषीत किया गया है।

धारा २ परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

धारा २ (ट)  “ राज्य सूचना आयोग” से धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन गठित राज्य सूचना आयोग अभिप्रेत है;


राज्य सूचना आयोग

राज्य सूचना आयोग का गठन

धारा 15. (1) प्रत्येक राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ...................... राज्य का नाम सूचना आयोग के नाम से ज्ञात एक निकाय का गठन करेगी, जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का पालन करेगा, जो उसे इस अधिनियम के अधीन सौंपे जाएं।


(2)   राज्य सूचना आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-

     (क) राज्य मुख्य सूचना आयुक्त; और 

      (ख) दस से अनधिक उतनी संख्या में राज्य सूचना आयुक्त, जितने आवश्यक समझे जाएं।


(3)  राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा निम्निलिखित से मिलकर बनी किसी समिति की सिफारिशपर की जाएगी-

i. मुख्यमंत्री, जो समिति का अध्यक्ष होगा।

विधानसभा में विपक्ष का नेता; और

ii. मुख्यमंत्री द्वारा नाम निर्दिष्ट किया जाने वाला  मंत्रिमंडल का सदस्य।

स्पष्टीकरण – शंकाओं के निवारण के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां विधान सभा में विपक्षी दल  के नेता को उस रूप में मान्यता नहीं दी गई है, वहां विधान सभा में सरकार के विपक्षी एकल सबसे बडे समूह के नेता को विपक्षी दल का नेता समझा जाएगा।


(4) राज्य सूचना आयोग के कार्यों का साधारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबंध राज्य मुख्य सूचना आयुक्त से निहीत होगा, जिसकी सहायता राज्य सूचना आयुक्तों द्वारा की जाएगी और वह ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा, जिनका राज्य सूचना आयोग द्वारा  इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य प्राधिकारी के निर्देशों के अधीन रहे बिना स्वतंत्र रुप से प्रयोग किया जा सकता है या जो की जा सकती है।


(5) राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त विधि, विज्ञान ओर प्रौद्यगिकी, समाज सेवा, प्रबंध, पत्रकरिता, जनसंपर्क माध्यम या प्रशासन तथा शासन का व्यापक ज्ञान और अनुभव रखने वाले जनजीवन में प्रख्यात व्यक्ति होंगे।


(6) राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या कोई राज्य सूचना आयुक्त, यथास्थिति, संसद का सदस्य या किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्रों के विधान-मंडल का सदस्य नहीं होगा या कोई अन्य लाभ का पद धारित नहीं करेगा या किसी राजनैतिक दल से संबद्ध नहीं होगा अथवा कोई कारबार नहीं करेगा या कोई वृत्ति नहीं करेगा।


(7) राज्य सूचना आयोग का मुख्यालय, राज्य में ऐसे स्थान पर  होगा और जिसे राज्य  सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करें और राज्य  सूचना आयोग, राज्य   सरकार के पूर्व अनुमोदन से, राज्य  में अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकेगा।


टिप्पणी

              इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग तथा कृत्यों का निर्वहन करने के लिए धारा 15 में एक राज्य सूचना आयोग का गठन का प्रावधान किया गया है। आयोग का गठन  राजपत्र में अधिसूचना जारी करते हुए राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा।

गठन- 

   राज्य सूचना आयोग का गठन निम्नांकित से मिलकर होगा-

राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एक; तथा

राज्य केन्द्रीय सूचना आयुक्त (अधिक तम दस)

चयन समिति- 

         राज्य  मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जायेगी। इन पदों पर नियुक्त हेतु नामों की अनुशंसा एक चयन  समिति द्वारा की जाएगी, जिसमें निम्नांकित सदसय होंगे-

 (क) मुख्यमंत्री                                          अध्यक्ष

(ख) विधान सभा में विपक्ष का नेता                     सदस्य

(ग)  मुख्यमंत्री द्वारा नामनिर्देष्ट                         सदस्य  

       एक मंत्री


अधीक्षण की शक्तियां-

           राज्य सूचना आयोग के कार्यों के अधीक्षण, निदेशन और प्रबंधन की शक्तियां मुख्य सूचना आयुक्त में निहीत होगी। सूचना आयुक्तों द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त के कार्यों में सहायता की जायेगी।


अहर्तायें

क. विधि;

ख. विज्ञान और प्रौद्योगिकी;

ग. समाज सेवा;

घ. प्रबंधन;

ङ. पत्रकारिता;

च. जन माध्यम;

छ. प्रशासन; अथवा

ज. शासन।

प्रतिबंध-

            राज्य मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त-

 (क)  संसद या राज्य विधान मण्डल के सदस्य नहीं होगे;

(ख)  लाभ का कोई अन्य पद धारण नहीं कर सकेंगे;

(ग)  किसी राजनितिक दल से सम्बद्ध नहीं होंगे; अथवा

(घ)  कोई कारबार या वृत्ति नहीं कर सकेंगे।


मुख्यालय- 

राज्य सूचना आयोग का मुख्यालय  ऐसे स्थान पर होगा जो राज्य  सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी कर विहित्त करें।दिल्ली में होगा। 

        राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से आयोग द्वारा  मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा भारत में अन्य स्थानों पर अपने कार्यालय स्थापित किए जा सकेंगे।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (ठ) के अनूसार “ राज्य मुख्य सूचना आयुक्त” और राज्य सूचना आयुक्त कि परिभाषा क्या है? धारा २ (ठ) में “ राज्य मुख्य सूचना आयुक्त” और राज्य सूचना आयुक्त से क्या अभिप्रेत है?

उत्तर - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (ठ) “ राज्य मुख्य सूचना आयुक्त” और राज्य सूचना आयुक्त को परिभाषीत किया गया है।

धारा २ परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

धारा २ (ठ) “ राज्य मुख्य सूचना आयुक्त” और राज्य सूचना आयुक्त से धारा 15 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त अभिप्रेत है;


धारा 15 की उपधारा (3)  राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा निम्निलिखित से मिलकर बनी किसी समिति की सिफारिशपर की जाएगी-

i. मुख्यमंत्री, जो समिति का अध्यक्ष होगा।

विधानसभा में विपक्ष का नेता; और

ii. मुख्यमंत्री द्वारा नाम निर्दिष्ट किया जाने वाला  मंत्रिमंडल का सदस्य।

स्पष्टीकरण – शंकाओं के निवारण के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां विधान सभा में विपक्षी दल  के नेता को उस रूप में मान्यता नहीं दी गई है, वहां विधान सभा में सरकार के विपक्षी एकल सबसे बडे समूह के नेता को विपक्षी दल का नेता समझा जाएगा।


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005  कि धारा २ (ड) के अनूसार “ राज्य लोक सूचना अधिकारी” कि परिभाषा क्या है? धारा २ (ड) “ राज्य लोक सूचना अधिकारी” से क्या अभिप्रेत है? 

उत्तर - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (ड) में “ राज्य लोक सूचना अधिकारी” को परिभाषीत किया गया है।

धारा २ परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

धारा २ (ड) “ राज्य लोक सूचना अधिकारी” से उपधारा (1) के अधीन पदाभिहीत राज्य लोक सूचना अधिकारी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत धारा 5 की उपधारा (2)  के अधीन उस रूप में पदाभिहित राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी भी है;


धारा 5. लोक सूचना अधिकारियों का पदनाम

धारा 5 की उपधारा (2) उपधारा (1)  के उपबंधों पर प्रतिकुल प्रभाव डाले बिना, प्रत्क लोक प्राधिकारी, इस अधिनियम के अधिनियमन के सौ दिन के भीतर किसी अधिकारी को प्रत्येक उपमंडल स्तर या अन्य उप जिला स्तर पर इस अधिनियम के अधीन सूचना या अपीलों के लिए आवेदन प्राप्त करने और तुरंत उसे या धारा 19  की उपधारा (1)  के अधीन विनिर्दिष्ट वरिष्ठ अधिकारी या यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को अग्रेषित करने के लिए यथास्थिति, केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी या राज्य सहायक सूचना अधिकारी के रूप में पदाभिहित करेगाः

परंतु यह कि जहां सूचना या अपील के लिए कोई आवेदन यथास्थिति, किसी केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी या किसी राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी कोदिया जाता है, वहां धारा 7 की उपधारा (1)  के अधीन विनिर्दिष्ट उत्तर के लिए अवधि की संगणना करने में पांच दिन की अवधि जोड दी जाएगी।  


प्रश्न-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा धारा २ (ढ) के अनूसार  “ पर व्यक्ति ” कि परिभाषा क्या है? धारा २ (ढ) में “ पर व्यक्ति” से क्या अभिप्रेत है? 

उत्तर - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कि धारा २ (ढ) “ पर व्यक्ति”  को परिभाषीत किया गया है।

धारा २ परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

धारा २ (ढ) “ पर व्यक्ति” से सूचना के लिए अनुरोध करने वाले नागरिक से भिन्न कोई व्यक्ति अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत कोई लोक प्राधिकारी भी है।


प्रश्न-सूचना का अधिकार और लोक प्राधिकारियों की बाध्यताएं इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार होगा। धारा 3 सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार प्रदान करती है, लेकिन इस अधिनियम के अन्य उपबंधो के अधीन रहते हुए वे कौन सी हैं ?

धारा 3. सूचना का अधिकार

इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार होगा। 

टिप्पणी

 धारा 3 सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार प्रदान करती है, लेकिन स अधिनियम के अन्य उपबंधो के अधीन रहते हुए।

  सूचना का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार है। संविधान में भी इस अधिकार की पुष्टि की गई है। इसे अनुच्छेद 19 (1) (क) के अन्तर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार तथा अनुच्छेद 21  के अन्तर्गत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का एक अंग माना गया है।

  पीपुल्स युनियन फाँर सिविल लिबर्टीज बनाम यूनियन आफ इण्डिया के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा सूचना के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के अन्तर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का एक अंग माना गया है।

        सी प्रकार प्रभुदत्त बनाम युनियन आफ इण्डिया के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि – पत्रकार को बंदियों एवं कैदियों से साक्षात्कार करने तथा सूचना प्राप्त करने का अधिकार है यदि बंदी एवं कैदी स्वेच्छा से साक्षात्कार के लिए तैयार हो। न्यायालय ने कहा- संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क)  के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी निहीत है। वह प्रेस ही है जो व्यक्ति के विचारों तक जन साधारण तक पहुँचाता है। बंदियों एवं कैदियों को भी स स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के मूल अधिकारों को जेल की दीवारों से बाहर नहीं किया जा सकता।

     ठिक ऐसे ही विचार एम. हसन बनाम गनर्नमेन्ट अफ आन्ध्रप्रदेश के मामले में अभिव्यक्त किए गए है।

 इस प्रकार सूचना के अधिकार को व्यक्ति का मूल अधिकार माना गया है।


प्रश्न-सूचना का अधिकार और लोक प्राधिकारियों की बाध्यताएं इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार होगा। धारा 3 सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार प्रदान करती है, लेकिन इस अधिनियम के अन्य उपबंधो के अधीन रहते हुए वे कौन सी हैं ?

धारा 3. सूचना का अधिकार

इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार होगा। 

टिप्पणी

 धारा 3 सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार प्रदान करती है, लेकिन स अधिनियम के अन्य उपबंधो के अधीन रहते हुए।

  सूचना का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार है। संविधान में भी इस अधिकार की पुष्टि की गई है। इसे अनुच्छेद 19 (1) (क) के अन्तर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार तथा अनुच्छेद 21  के अन्तर्गत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का एक अंग माना गया है।

  पीपुल्स युनियन फाँर सिविल लिबर्टीज बनाम यूनियन आफ इण्डिया के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा सूचना के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के अन्तर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार का एक अंग माना गया है।

        सी प्रकार प्रभुदत्त बनाम युनियन आफ इण्डिया के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि – पत्रकार को बंदियों एवं कैदियों से साक्षात्कार करने तथा सूचना प्राप्त करने का अधिकार है यदि बंदी एवं कैदी स्वेच्छा से साक्षात्कार के लिए तैयार हो। न्यायालय ने कहा- संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क)  के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी निहीत है। वह प्रेस ही है जो व्यक्ति के विचारों तक जन साधारण तक पहुँचाता है। बंदियों एवं कैदियों को भी स स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के मूल अधिकारों को जेल की दीवारों से बाहर नहीं किया जा सकता।

     ठिक ऐसे ही विचार एम. हसन बनाम गनर्नमेन्ट अफ आन्ध्रप्रदेश के मामले में अभिव्यक्त किए गए है।

 इस प्रकार सूचना के अधिकार को व्यक्ति का मूल अधिकार माना गया है।


प्रश्न- अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमयों में सूचना का अधिकार को मान्यता प्रदान की गई है  क्या वे कौन - कौन सी है ?

उत्तर-

अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमयों में सूचना का अधिकार

 सूचना के अधिकार को अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमयों प्रसंविदाओं आदि में भी मान्यता प्रदान की गई है, यथा –

1. मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा 1948 के अनुच्छेद 19 में प्रत्येक व्यक्ति को विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इस अधिकार में सूचना पाने के अधिकार को भी सम्मिलित किया गया है।

2. सिविल एवं राजनितिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा, 1966 के अनुच्छेद 19  में भी प्रत्येक व्यक्ति को विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है जिसमें सूचना पाने का अधिकार भी समाहित है।

3. बालकों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय, 1989 के अनुच्छेद 13 में भी यह कहा गया है प्रत्येक बालक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होगा और इस अधिकार में सूचना पाने का अधिकार भी सम्मिलित माना जाएगा।

4. मानवाधिकारों पर युरोपियन अभिसमय, 1950 के अनुच्छेद 10 में भी यह व्यवस्था की गई है कि प्रत्येक व्यक्ति को सूचना के अधिकार सहित विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होगा।

5. मानव और लोक अधिकारों का अफ्रिकन चार्टर 1981 के अनुच्छेद 9 में यह कहा गया है कि- Every individual shall have the right to receive information अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को सूचना प्राप्त करने का अधिकार होगा।

6. मानवाधिकारों पर अमरिकन अभिसमय, 1969 के अनुच्छेद 13 के शीर्षक “Freedom of thought and expression” के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इस स्वतंत्रता के अधिकार में ‘सूचना प्राप्त करने का अधिकार’ भी सम्मिलित है।

इतना ही नहीं, अन्य अनेक देशों में भी सूचना का अधिकार प्रदान किए जाने के बारे में व्यवस्था की गई है; जैसे-

i. कनाडा में सूचना तक पहुँच का अधिकार अधिनियम, 1983;

ii. कोलम्बिया के 1991 के संविधान का अनुच्छेद 15;

iii. फ्रांस के मानव अधिकारों की घोषणा, 1789 का अनुच्छेद 14;

iv. न्युजीलैंड के बिल अफ राईटस की धारा 14;

v. नार्वे का सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 1970;

vi. साउथ अफ्रिका के संविधान, 1996 की धारा 32;

vii. स्पेन के संविधान का अनुच्छेद 105;

viii. इग्लैंड का सूचना का अधिकार अधिनियम, 2000 आदि।



Comments

Followers

बासी खबर की ताजगी

छत्तीसगढ़ में भारतमाला परियोजना

छत्तीसगढ़ में भारतमाला परियोजना के तहत रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर के लिए भूमि अधिग्रहण में बड़े पैमाने पर मुआवजा घोटाले का खुलासा हुआ है। इस घोटाले में राजस्व अधिकारियों और भू-माफियाओं की मिलीभगत से सरकारी खजाने को लगभग ₹43 करोड़ का नुकसान हुआ है।( स्त्रोत :  The Rural Press ) घोटाले का तरीका भूमि रिकॉर्ड में हेरफेर : अभनपुर तहसील के नायकबांधा, उरला, भेलवाडीह और टोकनी गांवों में भूमि अधिग्रहण के दौरान, अधिकारियों ने खसरा नंबरों में हेरफेर कर एक ही भूमि को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित कर दिया। इससे 17 असली भू-स्वामियों की भूमि को 97 हिस्सों में बांटकर 80 नए नाम रिकॉर्ड में जोड़ दिए गए ।(स्त्रोत :  हरिभूमि ) मुआवजा राशि में बढ़ोतरी : इस हेरफेर के परिणामस्वरूप, मुआवजा राशि ₹29.5 करोड़ से बढ़कर ₹78 करोड़ हो गई, जिससे ₹43 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान हुआ ।( स्त्रोत :  The Rural Press ) जांच और कार्रवाई शिकायत और जांच : 8 अगस्त 2022 को कृष्ण कुमार साहू और हेमंत देवांगन ने इस घोटाले की शिकायत की। इसके बाद, रायपुर कलेक्टर ने जांच के आदेश दिए, जिसमें घोटाले की प...

लालफीताशाही बनाम सुशासन

भारत में लालफीताशाही (Red Tapeism) एक ऐसी प्रशासनिक प्रणाली को दर्शाती है जिसमें सरकारी कार्य अत्यधिक नियमों, प्रक्रियाओं और दस्तावेज़ीकरण की वजह से धीमी गति से होते हैं। यह शब्द आमतौर पर नकारात्मक अर्थ में प्रयोग होता है और इसके कारण नागरिकों, उद्यमियों और कभी-कभी स्वयं अधिकारियों को भी भारी परेशानी होती है। छत्तीसगढ़ प्रदेश में हाल में कई राष्ट्रीय एजेंसियां भ्रष्टाचार के प्रकरणों में अन्वेषण कर रही है, तथाकथित प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों पर लगातार हो रही कार्यवाहियां यह दर्शाता है कि प्रशासनिक नक्सलवाद कई दशकों से छत्तीसगढ़ के सम्पदा का दोहन विधिविरुद्ध तरीके से प्रशासनिक अधिकारी कर रहें है. लालफीताशाही के प्रमुख लक्षण: ब्यूरोक्रेटिक प्रक्रिया की अधिकता: किसी भी कार्य को करने के लिए अनेक स्तरों पर अनुमति लेनी पड़ती है। निर्णय लेने में विलंब: अधिकारी निर्णय लेने से बचते हैं या अत्यधिक दस्तावेज़ मांगते हैं। दस्तावेज़ों की अधिकता: फॉर्म भरने, प्रमाणपत्र देने, अनुमोदन लेने आदि के लिए कई दस्तावेज़ों की आवश्यकता होती है। अधिकारियों का असहयोग: कई बार सरकारी कर्मचारी नागरिकों को...

कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व

  छत्तीसगढ़ में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के लिए सीएसआर फंडिंग का उद्देश्य निम्नलिखित प्रमुख सामाजिक और विकासात्मक लक्ष्यों की पूर्ति करना है: ✅ 1. सामाजिक विकास और कल्याण: CSR फंडिंग का मुख्य उद्देश्य समाज के कमजोर, वंचित और पिछड़े वर्गों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना है। इसके तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण संबंधी पहल की जाती हैं। ✅ 2. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देना: सरकारी व ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार, स्मार्ट क्लास, छात्रवृत्ति, पुस्तकें और शिक्षण संसाधनों की व्यवस्था की जाती है। ✅ 3. स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार: CSR फंडिंग से ग्रामीण अस्पतालों का आधुनिकीकरण, मोबाइल हेल्थ क्लिनिक, टीकाकरण अभियान, मातृ और शिशु स्वास्थ्य, और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए सहायता दी जाती है। ✅ 4. आजीविका और कौशल विकास: ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण (Skill Development), स्वयं सहायता समूह (SHGs) के सशक्तिकरण, और रोजगारपरक कार्यक्रमों का संचालन किया जाता है। ✅ 5. पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग...