प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार तृतीय पक्ष से क्या अभिप्राय है? तृतीय पक्ष से सम्बन्धित सूचना के प्रकटीकरण की क्या प्रक्रीया है?
1) उत्तर: जहां, किसी यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी का, इस अधिनियम के अधीन किए गए अनुरोध पर कोई ऐसी सूचना या अभिलेख या उसके किसी भाग को प्रकट करने का आशय है, जो किसी पर –व्यक्ति से संबंधित है या उसके द्वारा प्रदाय किया गया है उस पर-व्यक्ति द्वारा उसे गोपनीय माना गया है, वहां यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी अनुरोध प्राप्त होने से पांच दिन के भीतर ऐसे पर-व्यक्ति को अनुरोध की और इस तथ्य की लिखित रूप में सूचना देगा कि यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी का उक्त सूचना या अभिलेख या उसके किसी भाग को प्रकट करने का आसय है, और इस बाबत कि सूचना प्रकट की जानी चाहिए या नहीं, लिखित में या मौखिक रूप से निवेदन करने के लिए पर-व्यक्ति को आमंत्रित करेगा तथा सूचना के प्रकटन की बात कोई विनिश्चय करते समय पर-व्यक्ति के ऐसे निवेदन को ध्यान में रखा जाएगाः
परंतु विधि द्वारा संरक्षित व्यापार या वाणिज्यिक गुप्त बातों की दशा में के सिवाय, यदि ऐसे प्रकटन में लोकहित, ऐसे पर-व्यक्ति के हितों की किसी संभावित अपहानि या क्षति से अधिक महत्त्वपूर्ण है तो प्रकटन अनुज्ञात किया जा सकेगा।
2) जहां उपधारा (1) के अधीन यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी द्वारा पर-व्यक्ति पर किसी सूचना या अभिलेख या उसके किसी भाग की बाबत कोई सूचना तामील की जाती है, वहां ऐसे पर-व्यक्ति को, ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से दस दिन के भीतर, प्रस्तावित प्रकटन के विरूद्ध अभ्यावेदन करने का अवसर दिया जाएगा।
3) धारा 7 में किसी बात के होते हुए भी, यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य सूचना अधिकारी धारा 6 के अधीन अनुरोध प्राप्त होने के पश्चात चालीस दिन के भीतर, यदि पर –व्यक्ति को उपधारा (2) के अधीन अभ्यावेदन करने का अवसर दे दिया गया है, तो इस बारे में विनिश्चय करेगा कि उक्त सूचना या अभिलेख या उसके भाग का प्रकटन किया जाए या नहीं और अपने विनिश्चय की सूचना लिखित में पर –व्यक्ति को देगा।
4) उपधारा (3) के अधीन दी गई सूचना में यह कथन भी सम्मिलित होगा कि वह पर –व्यक्ति ,जिसे सूचना दी गई है, धारा 19 के अधीन उक्त विनिश्चय के विरूद्ध अपील करने का हकदार है।
प्रश्न 15. सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार सूचना हेतु आवेदन प्रक्रिया क्या है?
उत्तर: कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन कोई सूचना अभिप्राप्त करना चाहता है, लिखित में या इलेक्ट्रानिक युक्ति के माध्यम से अंग्रेजी या हिन्दी में या क्षेत्र की राजभाषा जिसमें आवेदन किया जा रहा है, ऐसी फीस के साथ, जो विहित की जाए,-
(क) संबंधित लोक प्राधिकरण के यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी;
(ख) यथास्थिति, केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी या राज्य
सहायक लोक सूचना अधिकारी;
को, उसके द्वारा माँगी गई सूचना की विशष्टियां विनिर्दिष्ट करते हुए अनुरोध करेगा:
सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी अनुरोध करने वाले व्यक्ति को सभी युक्तियुक्त सहायता मौखिक रूप से देगा, जिससे कि उसे लेखबद्ध किया जा सके।
4. सूचना के लिए अनुरोध करने वाले आवेदक से सूचना का अनुरोध करने वाले अनुरोध के लिए किसी कारण को या किसी अन्य व्यक्तिगत ब्यौरे को, सिवाय उसके जो उससे संपर्क करने के लिए आवश्यक हो, देने की अपेक्षा नहीं की जाएगी।
5. जहां, किसी ऐसी सूचना के लिए अनुरोध करते हुए कोई आवेदन किसी लोक प्राधिकारी को किया जाता है,-
iii. जो किसी अन्य लोक प्राधिकारी द्वारा धारित की गई है; या
iv. जिसकी विषय- वस्तु किसी अन्य लोक प्राधिकारी के कृत्यों से अधिक निकट रूप से संबंधित है,
वहां, वह लोक प्राधिकारी, जिसको ऐसा आवेदन किया जाता है, ऐसे आवेदन या उसके ऐसे भाग को, जो समुचित हो, उस अन्य लोक प्राधिकारी को अंतरित करेगा और ऐसे अतंरण के संबंध में आवेदक को तुरंत सूचना देगा:
परंतु यह कि उपधारा के अनुसरण में किसी आवेदन का अंतरण यथासाध्य शीघ्रता से किया जाएगा, किन्तु किसी भी दशा में आवेदन की प्राप्ति की तारीख से पांच दिनों के पश्चात नहीं किया जाएगा।
प्रश्न . सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार आवेदक को सूचना किस समय सीमा में मिल जाना अपेक्षित है?
उत्तर: धारा 5 की उपधारा (2) के परंतुक या धारा 6 की उपधारा (3) के परंतुक के अधीन रहते हुए, धारा 6 के अधीन अनुरोध के प्राप्त होने पर, यथास्थिति, किसी केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी यथा संभव शीघ्रता से, और किसी भी दशा में अनुरोध की प्राप्ति के तीस दिन के भीतर, ऐसी फीस के संदाय पर, जो विहीत की जाए, या तो सूचना उपलब्ध कराएगा या धारा 8 और धारा 9 में विनिर्दिष्ट कारणों में ये किसी कारण से अनुरोध को अस्वीकार करेगा:
परंतु जहां मांगी गई जानकारी का संबंध किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से है, वहां वह अनुरोध प्राप्त होने के अडतालीस घंटे के भीतर उपलब्ध कराई जाएगी।
2. यदि लोक सूचना अधिकारी, उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर सूचना के लिए अनुरोध पर विनिश्चय करने में असफल रहता है, यथास्थिति, किसी केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने अनुरोध को नामंजूर कर दिया।
3. यदि तृतीय पक्ष के हित निहित है तो समयावधि 40दिन है; (इसमे तृतीय पक्ष को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए दी गई 10 दिन की अवधि सम्मिलित है।)
4. मानवीय अधिकारों के हनन के आरोपों सम्बन्धी सूचना केन्द्रीय, सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग जैसी भी स्थिति हो, के पुर्व अनुमोदन पश्चात 45 दिन में उपलब्ध कराई जावेगी।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार आवेदन शुल्क कितना देना होगा?
1. उत्तर: जहां, सूचना उपलब्ध कराने की लागत के रूप में किसी और फीस के संदाय पर सूचना उपलब्ध कराने का विनिश्चय किया जाता है, वहां यथास्थिति, किसी केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी अनुरोध करने वाले व्यक्ति को,
(क) उपधारा (1) के अधीन विहीत फीस के अनुसरण में रकम निकालने के लिए की गई संगणनाओं के साथ उसके द्वारा यथाअवधारित सूचना उपलब्ध कराने की लागत के रूप में और फिस के ब्यौरे देते हुए उससे उस फीस को जमा करने का अनुरोध करते हुए कोई संसूचना भेजेगा और उक्त संसूचना के प्रेषण और फिस के संदाय के बीच मध्यवर्ती अवधि को उस धारा में निर्दिष्ट तीस दिन की अवधि की संगणना करने के प्रोयजन के लिए अपवर्जित किया जाएगा;
(ख) प्रभारित फिस की राशि या उपलब्ध कराई गई पहुंच के प्ररूप के बारे में, जिसके अंतर्गत अपील प्राधिकारी की विशिष्टियां, समय-सीमा, प्रक्रिया और कोई अन्य प्ररूप भी है, विनिश्चय के पुनर्विलोकन के संबंध में उसके अधिकार से संबंधित सूचना देते हुए, कोई संसूचना भेजेगा।
2. जहां, इस अधिनियम के अधीन अभिलेख या उसके किसी भाग तक पहुंच अपेक्षित है और ऐसा व्यक्ति, जिसको पहुंच उपलब्ध कराई जाना है, संवेदनात्मक रूप से निःशक्त है, वहां यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी सूचना तक पहंच को समर्थ बनाने के लिए सहायता उपलब्ध कराएगा जिसमें निरीक्षण के लिए ऐसी सहायता कराना सम्मिलित है, जो समुचित हो।
3. जहां, सूचना तक पहंच मुद्रीत या किसी इलेक्ट्रानिक प्ररूप में उपलब्ध कराई जानी है, वहां आवेदक, उपधारा (6) के अधीन रहते हुए ऐसी फीस का संदाय करेगा, जो विहीत की जाए:
परंतु धारा 6 की उपधारा (1) और धारा 7 की उपधारा (1) और उपधारा (5) के अधीन विहीत फीस युक्तियुक्त होगी और ऐसे व्यक्तियों से, जो गरीबी की रेखा के नीचे है, कोई फिस प्रभारित नहीं की जाएगी, जैसा समूचित सरकार द्वारा अवधारित किया जाए।
4. उपधारा (5) में किसी बात के होते हुए भी, जहां कोई लोक प्राधिकारी उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट समय-सीमा का अनुपालन करने में असफल रहता है, वहां सूचना के लिए, अनुरोध करने वाले व्यक्ति कोप्रभार के बिना सूचना उपलब्ध कराई जाएगी।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार सूचना आवेदन किन-किन कारणों से निरस्त किया जा सकता है?
उत्तर: यदि यह सूचना के प्रकटीकरण से छूट में शामिल है।
यदि यह सरकार के अतिरिक्त किसी व्यक्ति के कोपीराइट का उल्लंघन करती है।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर: (1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा केन्द्रीय सूचना आयोग के नाम से ज्ञात एक निकाय का गठन करेगी, जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का पालन करेगा, जो उसे इस अधिनियम के अधीन सौंपे जाएं।
(2) केन्द्रीय सूचना आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-
(क) केन्द्रीय सूचना आयुक्त; और
(ख) दस से अनधिक उतनी संख्या में केन्द्रीय सूचना आयुक्त, तने आवश्यक समझे जाएं।
(3) मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा निम्निखित से मिलकर बनी समिति की सिफारिश की जाएगी-
i. प्रधानमंत्री, जो समिति का अध्यक्ष होगा।
ii. लोकसभा में विपक्ष का नेता; और
iii. प्रधानमंत्री द्वारा नाम निर्दिष्ट संध मंत्रिमंडल का एक मंत्री।
स्पष्टीकरण – शंकाओं के निवारण के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां लोक सभा में विपक्ष के नेता को उस रूप में मान्यता नहीं दी गई है, वहां लोक सभा में सरकार के विपक्षी एकल सबसे बडे समूह के नेता को विपक्ष का नेता समझा जाएगा।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार मुख्य सूचना आयुक्त /सूचना आयुक्त के पद की पात्रता का मानदण्ड क्या है? विवेचना कीजिए?
उत्तर: मुख्य सूचना आयुक्त /सूचना आयुक्त के पद का अभ्यर्थी विधि, विज्ञान एवं तकनीकी, सामाजिक सेवा, प्रबंध, पश्रकारिता, मास मीडीया या प्रशासन और शासन में व्यापक ज्ञान एवं अनुभव सहित सार्वजनिक जीवन में श्रेष्ठता प्राप्त व्यक्ति होना चाहिए।
मुख्य सूचना आयुक्त /सूचना आयुक्त संसद सदस्य या विधानसभा सदस्य नहीं होगा। उसके पास लाभ का पद, किसी राजनैतिक दल से सम्बन्ध या कोई व्यापार या व्यवसाय नहीं होगा।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल और अन्य सेवा शर्ते क्या है?
1) उत्तर: सूचना आयुक्त, उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा और पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा:
पंरतु यह कि कोई मुख्य सूचना आयुक्त पैसठ वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात उस रूप में पद धारण नहीं करेगा।
2) प्रत्येक सूचना आयुक्त, उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है पांच वर्ष की अवधि के लिए या पैसंठ वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो पद धारण करेगा और एसे सूचना आयुक्त के रूप में पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा:
परंतु प्रत्येक सूचना आयुक्त, इस उपधारा के अधीन अपना पद रिक्त करने पर धारा 12 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट रीति से मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्त के लिए पात्र होगा;
परंतु यह और कि जां सूचना आयुक्त को मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्त किया जाता है वहां उसकी पदावधि सूचना आयुक्त और मूख्य सूचना आयुक्त के रूप में कुल मिलाकर पांच वर्ष से अधिक नहीं होगी।
3) मुख्य सूचना आयुक्त या कोई सूचना आयुक्त, अपना पद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति या उनके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के समक्ष पहली अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए उपवर्णित प्ररूप के अनुसार एक शपथ या प्रतिज्ञान लेगा और उस पर हसताक्षर करेगा।
4) मुख्य सूचना आयुक्त या कोई सूचना आयुक्त, किसी भी समय, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा:
परंतु मुख्य सूचना आयुक्त या किसी सूचना आयुक्त को धारा 14 में विनिर्दिष्ट रीति से हटाया जा सकेगा।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार सूचना आयुक्त का कार्यकाल और अन्य सेवा शर्ते क्या है?
उत्तर: सूचना आयुक्त अपने पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु प्राप्ति तक जो भी पहले हो, के लिए नियुक्त होगा। वह उसी पद पर पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा। सूचना आयुक्त मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त का पात्र होगा; परंतु उसका दोनों पदों का कुल कार्यकाल 5 वर्ष से अधिक नहीं होगा।
सूचना आयुक्त के वेतन और भत्ते एवं अन्य सेवा शर्तें वहीं होंगी, जो निर्वाचन आयुक्त की है। सूचना आयुक्त के सेवाकाल में उसके अहित में उनका परिवर्तन नहीं होगा।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार क्या मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त अपने पद से त्याग पत्र दे सकता है और क्या उन्हें उनके पद से हटाया जा सकता है?
उत्तर: (1) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, मुख्य सूचना आयुक्त या किसी सूचना आयुक्त को राष्ट्रपति के आदेश द्वारा साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर उसके पद से तभी हटाया जाएगा, जब उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रपति द्वारा उसे किए गए किसी निर्देश पर जांच के पश्चात यह रिपोर्ट दी हो कि, यथास्थिति, मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त को उस आधारपर हटा दिया जाना चाहिए।
(2) राष्ट्रपति, उस मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त को, जिसके विरूद्ध उपधारा (1) के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश किया गया है, ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट प्राप्त होने पर राष्ट्रपति द्वारा आदेश पारित किए जाने तक पद से निलंबित कर सकेगा और यदि आवश्यक समझे तो जांच के दौरान कार्यालय में उपस्थिति होने से भी प्रतिषिद्ध कर सकेगा।
(3) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी राष्ट्रपति, मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त को आदेश द्वारा पद से हटा सकेगा, यदि यथास्थिति, मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त-
(क) दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है; या
(ख) वह ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध ठहराया गया है, जिसमें राष्ट्रपति के राय में, नैतिक अधमता अंतर्वतित है; या
(ग) अपनी पदावधि के दौरान, अपने पद के कर्तव्यों से परे किसी वैतनिक नियोजन में लगा हुआ है; या
(घ) राष्ट्रपति की राय में, मानसिक या शारीरिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य है; या
(ड) उसने ऐसे वित्तिय और अन्य हित अर्जित किए है, जिनसे मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पडने की संभावना है।
(4) यदि मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त , किसी प्रकार भारत सरकार द्वारा या उसमें हितबद्ध है या किसी संविदा या करार से संबंद्ध या उसमें हितबद्ध है या किसी निगमित कंपनी के किसी सदस्य के रूप में से अन्यथा और उसके अन्य सदस्यों के साथ सामान्यत: उसके लाभ में या उससे प्रोदभूत होने वाले किसी फायदे या परिलब्धियों में हिस्सा लेता है तो वह उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, कदाचार का दोषी समझा जाएगा।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार राज्य सूचना आयोग का गठन किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर: (1) प्रत्येक राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ...................... राज्य का नाम सूचना आयोग के नाम से ज्ञात एक निकाय का गठन करेगी, जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का पालन करेगा, जो उसे इस अधिनियम के अधीन सौंपे जाएं।
(2) राज्य सूचना आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-
(क) राज्य मुख्य सूचना आयुक्त; और
(ख) दस से अनधिक उतनी संख्या में राज्य सूचना आयुक्त, जितने आवश्यक समझे जाएं।
(3) राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा निम्निलिखित से मिलकर बनी किसी समिति की सिफारिशपर की जाएगी-
i. मुख्यमंत्री, जो समिति का अध्यक्ष होगा।
विधानसभा में विपक्ष का नेता; और
ii. मुख्यमंत्री द्वारा नाम निर्दिष्ट किया जाने वाला मंत्रिमंडल का सदस्य।
स्पष्टीकरण – शंकाओं के निवारण के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां विधान सभा में विपक्षी दल के नेता को उस रूप में मान्यता नहीं दी गई है, वहां विधान सभा में सरकार के विपक्षी एकल सबसे बडे समूह के नेता को विपक्षी दल का नेता समझा जाएगा।
(4) राज्य सूचना आयोग के कार्यों का साधारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबंध राज्य मुख्य सूचना आयुक्त से निहीत होगा, जिसकी सहायता राज्य सूचना आयुक्तों द्वारा की जाएगी और वह ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा, जिनका राज्य सूचना आयोग द्वारा इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य प्राधिकारी के निर्देशों के अधीन रहे बिना स्वतंत्र रुप से प्रयोग किया जा सकता है या जो की जा सकती है।
(5) राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त विधि, विज्ञान ओर प्रौद्यगिकी, समाज सेवा, प्रबंध, पत्रकरिता, जनसंपर्क माध्यम या प्रशासन तथा शासन का व्यापक ज्ञान और अनुभव रखने वाले जनजीवन में प्रख्यात व्यक्ति होंगे।
(6) राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या कोई राज्य सूचना आयुक्त, यथास्थिति, संसद का सदस्य या किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्रों के विधान-मंडल का सदस्य नहीं होगा या कोई अन्य लाभ का पद धारित नहीं करेगा या किसी राजनैतिक दल से संबद्ध नहीं होगा अथवा कोई कारबार नहीं करेगा या कोई वृत्ति नहीं करेगा।
(7) राज्य सूचना आयोग का मुख्यालय, राज्य में ऐसे स्थान पर होगा और जिसे राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करें और राज्य सूचना आयोग, राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से, राज्य में अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकेगा।
प्रश्न -. सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार राज्य मुख्य सूचना आयुक्त / राज्य सूचना आयुक्त के पद की पात्रता का मानदण्ड क्या है?
उत्तर: राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त विधि, विज्ञान ओर प्रौद्यगिकी, समाज सेवा, प्रबंध, पत्रकरिता, जनसंपर्क माध्यम या प्रशासन तथा शासन का व्यापक ज्ञान और अनुभव रखने वाले जनजीवन में प्रख्यात व्यक्ति होंगे।
राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या कोई राज्य सूचना आयुक्त, यथास्थिति, संसद का सदस्य या किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्रों के विधान-मंडल का सदस्य नहीं होगा या कोई अन्य लाभ का पद धारित नहीं करेगा या किसी राजनैतिक दल से संबद्ध नहीं होगा अथवा कोई कारबार नहीं करेगा या कोई वृत्ति नहीं करेगा।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार राज्य मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल और अन्य सेवा शर्ते क्या है?
उत्तर: राज्य मुख्य सूचना आयुक्त अपने पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष तक अथवा 65 वर्ष की आयु प्राप्ति तक, जो भी पहिले हो, के लिए नियुक्त होगा। वह पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा।
राज्य मुख्य सूचना आयुक्त के वेतन और भत्ते एवं अन्य सेवा शर्ते वहीं होंगी, जो निर्वाचन आयुक्त की है। राज्य मुख्य सूचना के सेवाकाल में उसके अहित में उनका परिवर्तन नहीं होगा।
प्रश्न -. सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार राज्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल और अन्य सेवा शर्ते क्या है?
उत्तर: राज्य सूचना आयुक्त अपने पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष तक अथवा 65 वर्ष की आयु प्राप्ति तक, जो भी पहिले हो, के लिए नियुक्त होगा। वह पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा।
राज्य सूचना आयुक्त राज्य मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त का पात्र होगा, परन्तु उसका दोनों पदों का कुल कार्यकाल 5 वर्ष से अधिक नहीं होगा। राज्य सूचना आयुक्त कके वेतन और भत्ते एवं अन्य सेवा शर्ते वहीं होंगी, जो राज्य के मुख्य सचिव की है। राज्य सूचना के सेवाकाल में उसके अहित में उनका परिवर्तन नहीं होगा।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार क्या राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त अपने पद से त्याग पत्र दे सकता है और क्या उन्हें उनके पद से हटाया जा सकता है?
उत्तर: (1) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या किसी राज्य सूचना आयुक्त को राज्यपाल के आदेश द्वारा साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर उसके पद से तभी हटाया जाएगा, जब उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा उसे किए गए किसी निर्देश पर जांच के पश्चात यह रिपोर्ट दी हो कि, यथास्थिति, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त को उस आधारपर हटा दिया जाना चाहिए।
(2) राज्यपाल, उस राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त को, जिसके विरूद्ध उपधारा (1) के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश किया गया है, ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट प्राप्त होने पर राज्यपाल द्वारा आदेश पारित किए जाने तक पद से निलंबित कर सकेगा और यदि आवश्यक समझे तो जांच के दौरान कार्यालय में उपस्थिति होने से भी प्रतिषिद्ध कर सकेगा।
(3) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी राज्यपाल किसी बात के होते हुए भी राज्यपाल, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त याकिसी राज्य सूचना आयुक्त को आदेश द्वारा पद से हटा सकेगा, यदि यथास्थिति, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या राज्य सूचना आयुक्त-
(क) दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है; या
(ख) वह ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध ठहराया गया है, जिसमें राज्यपाल के राय में, नैतिक अधमता अंतर्वतित है; या
(ग) वह अपनी पदावधि के दौरान, अपने पद के कर्तव्यों से परे किसी वैतनिक नियोजन में लगा हुआ है; या
(घ) राज्यपाल की राय में, मानसिक या शारीरिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य है; या
(ड) उसने ऐसे वित्तिय और अन्य हित अर्जित किए है, जिनसे मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पडने की संभावना है।
(4) यदि राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या कोई राज्य सूचना आयुक्त, किसी प्रकार राज्य सरकार द्वारा या उसकी ओर से की गई किसी संविदा या करार से संबद्ध या उसमें हितबद्ध है या किसी निगमित कंपनी के किसी सदस्य के रूप में से अन्यथा और उसके अन्य सदस्यों के साथ सामान्यत: उसके लाभ में या उससे प्रोदभूत होने वाले किसी फायदे या परिलब्धियों में हिस्सा लेता है तो वह उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, कदाचार का दोषी समझा जाएगा।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार केन्द्रीय सूचना आयोग / राज्य सूचना आयोग के कृत्य एवं शक्तियां क्या है?
उत्तर: ) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह निम्नलिखित किसी ऐसे व्यक्ति से शिकायत प्राप्त करे और उसकी जांच करे-
(क) जो, यथास्थिति, किसी केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी को इस कारण से अनुरोध प्रस्तुत करने में असमर्थ रहा है कि इस अधिनियम के अधीन ऐसे अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई है या, यथास्थिति, केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी या राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी ने इस अधिनियम के अधीन सूचना या अपील के लिए धारा 19 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी अथवा ज्येष्ठ अधिकारी या यथास्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग को उसके आवेदन को भेजने के लिए स्विकार करने से इंकार कर दिया है,
(ख) जिसे इस अधिनियम के अधीन अनुरोध की गई कोई जानकारी तक पहुंच के लिए इंकार कर दिया गया है;
(ग) जिसे इस अधिनियम के अधीन विनिर्दिष्ट समय –सीमा के भीतर सूचना के लिए या सूचना तक पहुंच के लिए अनुरोध का उत्तर नहीं दिया गया है;
(घ) जिससे ऐसी फीस की रकम का संदाय करने की अपेक्षा की गई है जो वह अनुचित समझता है;
(ड) जो यह विश्वास करता है कि उसे इस अधिनियम के अधीन अपूर्ण भ्रम में डालने वाली या मिथ्या सूचना दी गई है; और
(च) इस अधिनियम के अधीन अभिलेखों के लिए अनुरोध करने का उन तक पहुंच प्राप्त करने से संबंधित किसी अन्य विषय के संबंध में।
(2) जहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग का यह समाधान हो जाता है कि उस विषय में जांच करने के लिए युक्तियुक्त आधार है, वहां वह उसके संबंध में जांच आरंभ कर सकेगा।
(3) 1908 का 5 - यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग को, इस धारा के अधीन किसी मामले में जांच करते समय वही शक्तियां प्राप्त होंगी, जो निम्नलिखित मामलों के संबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय के निहीत होती है, अर्थात-
(क) किन्हीं व्यक्तियों को समन करना और उन्हें उपस्थित करना तथा शपथ पर मौखिक या लिखित साक्ष्य देने के लिए और दस्तावेज या चीजें पेश करने के लिए उनको विवश करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और निरिक्षण की अपेक्षा करना;
(ग) शपथपत्र पर साक्ष्य को अभिग्रहण करना;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतियां मंगाना;
(ड) साक्षियों या दस्तावेजों की परिक्षा के लिए समन जारी करना; और
(च) कोई अन्य विषय, जो विहीत किया जाए।
(4) यथास्थिति, संसद या राज्य विधान-मंडल के किसी अन्य अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी असंगत बात के होते हुए भी, यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग इस अधिनियम के अधीन किसी शिकायत की जांच करने के दौरान, ऐसे किसी अभिलेख की परीक्षा कर सकेगा, जिसे यह अधिनियम लागू होता है और जो लोक प्राधिकारी के नियंत्रण में है और उसके द्वारा ऐसे किसी अभिलेख को किन्ही भी आधारों पर रोका नहीं जाएगा।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार क्या केन्द्रीय सूचना आयोग/ राज्य सूचना आयोग कानून की क्रियान्विति के बारे में कोई प्रतिवेदन तैयार करने के लिए आबद्ध है?
उत्तर: हर मंत्रालय/विभाग का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक वर्ष लोक प्राधिकरणों से प्रतिवेदन तैयार करावे, उसे संकलित करे और उसे केन्द्रीय सूचना आयोग अथवा राज्य सूचना आयोग जैसी भी स्थिति हो, को भेजे,
प्रत्येक प्रतिवेदन में निम्न विवरण होना चाहिए:
(क) प्रत्येक लोक प्राधिकरण द्वारा प्राप्त आवेदनों की संख्या;
(ख) निरस्त किए गए आवेदनों की संख्या;
(ग) अपीलों की संख्या एवं उनके परिणाम;
(घ) अधिकारियों के विरुद्ध की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही का विवरण;
(ड) एकत्रित शुल्क की धनराशि;
(च) अधिनियम की भावना या आशय के प्रबंध एवं क्रियान्वयन के लिए लोक प्राधिकरण द्वारा किए गए प्रयत्नों का विवरण;
(छ) सुधार के लिए सुझाव;
प्रतिवर्ष केन्द्रीय सूचना आयोग कानून की क्रियान्विति पर अपना वार्षिक प्रतिवेदन तैयार करेगा और केन्द्रीय सरकार को भेजेगा।
इसी प्रकार राज्य सूचना आयोग कानून की क्रियान्वति पर अपना प्रतिवेदन तैयार करेगा और राज्य सरकार को भेजेगा।
प्रत्येक वर्ष की समाप्ति के पश्चात केन्द्रीय सूचना आयोग के प्रतिवेदन को संसद में प्रस्तुत करेगी। इसी प्रकार राज्य सरकार सूचना आयोग के प्रतिवेदन को विधानसभा में प्रस्तुत करेगी।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार क्या व्यथित व्यक्ति लोक सूचना अधिकारी के निर्णय के विरुद्ध अपील कर सकता है?
उत्तर: ) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे धारा 7 की उपधारा (1) या उपधारा (3) के खंड (क) में विनिर्दिष्ट समय के भीतर कोई विनिश्चय प्राप्त नहीं हुआ है या जो, यथास्थिति, केन्द्रीय लोकसूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के किसी विनिश्चय से व्यथित है, उस अवधि की समाप्ति से या ऐसे किसी विनिश्चय की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर ऐसे अधिकारी को अपील कर सकेगा, जो प्रत्येक लोक प्राधिकरण में, यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या लोक सूचना अधिकारी की पंक्ति से ज्येष्ठ पंक्ति है:
परंतु ऐसा अधिकारी, तीस दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात अपील को ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय पर अपील फाइल करने में पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था।
(2) जहांअपील धारा 11 के अधीन, यथास्थिति, किसी केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्यलोक सूचना अधिकारी द्वारा, पर व्यक्ति की सूचना प्रकट करने के लिए किए गए किसी आदेश के विरूद्ध की जाती है वहां संबंधित पर व्यक्ति द्वारा अपील, उस आदेश की तारीख से 30 दिन के भीतर की जाएगी।
(3) उपधारा (1) के अधीन विनिश्चय के विरूद्ध दूसरी अपील उस तारीख से जिसको विनिश्चय किया जाना चाहिए था या वास्तव में प्राप्त किया गया था, नब्बे दिन के भीतर केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को होगी;
परंतु यथास्थिति, केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग नब्बे दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात अपील को ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय पर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था।
(4) यदि यथास्थिति केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्यलोक सूचना अधिकारी का विनिश्चय, जिसके विरूद्ध अपील की गई है, पर व्यक्ति की सूचना से संबंधित है तो यथास्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग उस पर व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देगा।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार क्या अपील अधिकारी के आदेश के विरुद्ध द्वितीय अपील की जा सकती है? यदि हां, तो कब?
उत्तर: अपील अधिकारी के निर्णय से व्यथित व्यक्ति निर्णय प्राप्ति की तिथि से, अथवि निर्णय की समयावधि में निर्णय न होने की स्थिति में, ऐसी समयावधि समाप्ति तिथि से 90 दिन की अवधि में द्वितित अपील सम्बन्धित सूचना आयोग को प्रस्तुत कर सकता है।
यदि अपीलार्थी पूर्व वर्णित समयावधि में पर्याप्त कारणों से अपील प्रस्तुत नहीं कर सका है, तो सम्बन्धित सूचना आयोग अपनी संतुष्टि पश्चात अपील ग्रहण कर सकता है।
यदि लोक सूचना अधिकारी का निर्णय जिसके विरुद्ध अपिल प्रस्तुत की गई है, तृतीय पक्ष की सूचना से सम्बन्धित है, तो सम्बन्धित सूचना आयोग तृतीय पक्ष को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर प्रदान करेगा।
अपीलीय कार्यवाही में, आवेदन की अस्वीकृति को न्यायोचित साबित करने का भार उस लोक सूचना अधिकारी पर होगा, जिसने आवेदन अस्वीकार किया है। सूचना आयोग अपने निर्णय द्वारा लोक प्राधिकरण से अधिनियम के प्रावधानों की अनुपालना करवाने, शिकायतकर्ता को हुई हानि या अन्य क्षति की पूर्ति करवाने, शास्ति आरोपित करने, आवेदन अस्वीकार करने की कार्यवाही कर सकता है। सूचना आयोग अपील का निर्णय निर्धारित प्रक्रिया अनुसार करेगा। वह अपने निर्णय मत अपील अधिकार होने के बारे में, यदि कोई है, शिकायतकर्ता एवं लोक प्राधिकरण को भेजेगा।
सूचना आयोग का निर्णय बाध्यकारी है।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार क्या दोषी लोक सूचना अधिकारी को दण्डित किया जा सकता है?
उत्तर: शिकायत या अपील का निर्णय करते समय यदि सम्बन्धित सूचना आयोग की यह धारणा बनती है कि लोक सूचना अधिकारी ने बिना समुचित कारण-
(क) बिना युक्तियुक्त कारण के कोई आवेदन लेने से इन्कार कर दिया गया है; या
(ख) निर्धारित समयावधि में कोई सूचना नहीं दी गई है; या
(ग) असदभावनापूर्वक किसी सूचना के अनुरोध से इन्कार कर दिया गया है; या
(घ) जानबुझकर गलत, भ्रामक या अपूर्ण सूचना दी गई हो; या
(ड) वांछित सूचना को नष्ट कर दिया गया है; या
(च) सूचना देने में किसी प्रकार की बाधा डाली गई है;
तब ऐसे अधिकारी पर, प्रत्येक दिन के लिए जब तक ऐसी सूचना नहीं दे दी जाती, 250/- रूपये की शास्ति अधिरोपित की जा सकेगी, लेकिन ऐसी शास्ति 25, 000/- रूपये से अधिक की नहीं हो सकेगी।
ऐसी शास्ति अधिरोपित करने से पूर्व संबंधित अधिकारी को सुनवाई का पर्याप्त अवसर प्रदान किया जायेगा।
यदि सूचना अधिकारी द्वारा बचाव में यह कहा जाता है कि उसके द्वारा युक्तियुक्त रूप से तथा तत्परतापूर्वक कार्य किया गया था, तब इसे साबित करने का भार उसी पर होगा।
आयोग द्वारा ऐसे अधिकारी के विरूद्ध सेवा नियमों के अन्तर्गत अनुशासनात्मक कार्यवाही करने की सिफारिश भी की जा सकेगी।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार क्या अधिनियम के अन्तर्गत किए गए कार्य के सम्बन्ध में न्यायालय हस्तक्षेप कर सकते है?
उत्तर: किसी भी व्यक्ति के द्वारा सदभावना में किए गए कार्य के विरुद्ध किसी प्रकार का वाद, अभियोजन या अन्य वैधिक कार्यवाही नहीं हो सकेगी। कोई न्यायालय इस अधिनियम में पारित किसी आदेश के सम्बन्ध में किसी प्रकार का वाद, आवेदन या अन्य वैधिक कार्यवाही ग्रहण नहीं करेगा और न ऐसे आदेश पर अधिनियम में की जाने वाली अपील के माध्यम के अलावा आपत्ति करेगा।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार जनता को सूचना के अधिकार की जानकारी देने के लिए समुचित सरकार क्या-क्या कदम उठा सकती है?
उत्तर: समुचित सरकार अपने वित्तिय एवं अन्य स्त्रोतों की प्राप्ति को ध्यान में रखते हुए जनता-
(क) जनता की, विशेष रूप से, उपेक्षित समुदायों की, इस अधिनियम के अधिन अनुध्यात अधिकारों का प्रयोग करने के ज्ञान में वृद्धि करने के लिए शैक्षिक कार्यक्रम बना सकेगी और आयोजित कर सकेगी;
(ख) लोक प्राधिकारियों को. खंड क में निर्दिष्ट कार्यक्रमों और आयोजन में भाग लेने और उनके लिए ऐसे कार्यक्रम करने के लिए बढावा दे सकेगी;
(ग) लोक प्राधिकारियों द्वारा उनके क्रियाकलापों के बारे में सही जानकारी का समय से और प्रभावी रूप में प्रसारित किए जाने को बढावा दे सकेगी;
(घ) लोक प्राधिकरणों के यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारीयों को प्रशिक्षित कर सकेगी और लोक प्राधिकरण द्वारा अपने प्रयोग के लिए सुसंगत प्रशिक्षण सामग्रीयों पेश कर सकेगी।
1. समुचित सरकार, इस अधिनियम के प्रारंभ से अठारह मास के भीतर, अपनी राजभाषा में, सहज व्यापक रूप और रिति से ऐसी सूचना वाली एक मार्गदर्शिका संकलित करेगी, जिसकी ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा युक्तियुक्त रूप में अपेक्षा की जाए, जो अधिनियम में विनिर्दिष्ट किसी अधिकार का प्रयोग करना चाहता है।
2. समुचित सरकार, यदि आवश्यक हो, उपधारा (2) में निर्दिष्ट मार्गदर्शी सिद्धान्तों को नियमित अंतरालों पर अद्यतन और प्रकाशित करेगी, जिनमें विशिष्टतया और उपधारा (2) की व्यापकता पर प्रतिकुल प्रभाव डाले बिना निम्नलिखित सम्मिलित होगा-
(क) इस अधिनियम के उद्देश्य;
(ख) धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्रत्येक लोक प्रधिकारी के यथास्थिति. केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्यलोक सूचना अधिकारी का डाक और गली का पता, फोन और फैक्स नंबर और यदि उपलब्ध हो तो उसका इलैक्ट्रोनिक डाक पता;
(ग) वह रीति और प्ररूप, जिसमें किसी यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी को किसी सूचना तक पहुंच का अनुरोध किया जाएगा;
(घ) इस अधिनियम के अधीन लोक प्राधिकरण के किसी यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी से उपलब्ध सहायता और उसके कर्तव्य;
(ड) आयोग से उपलब्ध सहायता;
( च) इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त या अधिरोपित किसी अधिकार या कर्तव्य की बाबत किसी कार्य या कार्य करने में असफल रहने के संबंध में विधि में उपलब्ध सभी उपचार, जिनके अंतर्गत आयोग को अपील फाइल करने की रिति भी है;
(छ) धारा 4 के अनुसार अभिलेखोंके प्रवर्गो के स्वैच्छिक प्रकटन के लिए उपबंध करने वाले उपबंध;
(ज) किसी सूचना तक पहुंच के लिए अनुरोधों के संबंध में संदत्त की जाने वाली फीसों से संबंधित सूचनाएं;
(झ) इस अधिनियम के अनुसार किसी सूचना तक पहुंच प्राप्त करने के संबंध में बनाए गए या जारी किए गए कोई अतिरिक्त विनियम या परिपत्र।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार क्या समुचित सरकार अधिनियम की क्रियान्विति के लिए नियम बना सकती है?
उत्तर: समुचित सरकार अधिनियम के प्रावधानों के भली प्रकार क्रियान्वयन के लिए सूचना सामग्री की कीमत, माध्यम की कीमत, विभिन्न प्रकार के देय शुल्क, आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन भत्ते, उनकी सेवा शर्तें, आयोग द्वारा निस्तारित की जाने वाली अपीलों की प्रक्रिया आदि के बारे में नियम बनावेगी।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार क्या अन्य संवैधानिक संस्थाएं अधिनियम के अन्तर्गत नियम बना सकती है और सूचना उपलब्ध करा सकती है?
उत्तर: सभी संवैधानिक संस्थाएं लोक प्राधिकरण की परिभाषा में सम्मिलित हैं। सरकार की तरह उनके द्वारा सूचना उपलब्ध कराने के लिए सक्षम प्राधिकारी अर्थात लोकसभा या विधानसभा या संघीय क्षेत्र की विधान सभा के अध्यक्ष, राज्य सभा या राज्य विधान मण्डलों के अध्यक्ष, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, संविधान के अन्तर्गत या द्वारा गठित या स्थापित अन्य प्राधिकरणों के अधयक्ष एवं केन्द्र शासित प्रदेशों के प्रशासक आवश्यक नियम बनावेंगे। इन नियमों में सूचना सामग्री की कीमत, माध्यम की कीमत, विभिन्न प्रकार के देय शुल्क एवं अन्य विवरण होगा। उसी अनुरूप सूचना उपलब्ध होगी।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार अधिनियम के क्रियान्वयन में आने वाली कठीनाईयों का किस प्रकार निराकरण किया जा सकता है?
उत्तर: सम्बन्धित सरकार या संवैधानिक संस्थाओं के समक्ष अधिकारी इस अधिनियम के प्रावधानोंकी क्रियान्विति हेतु नियम बनाने के लिए सक्षम है। वे क्रियान्वयन में आने वाली कठिनाईयों को दूर करने वास्ते आवश्यक / उपयुक्त आदेश जारी करने में सक्षम है, लेकिन इस प्रकार के आदेश अधिनियम के प्रभावशील होने से 2 वर्ष तक की अवधि में ही जारी हो सकेंगे। ऐसे आदेश राजपत्र में विज्ञापित होंगे।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार सूचना का अधिकार संविधान के अनुच्छेदों से सम्बन्ध रखता है?
उत्तर: संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के अन्तर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार से।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार वह कौन सा प्रकरण है जिसमें सूचना के अधिकार को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंग माना गया है?
उत्तर: पीपुल्स युनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम युनियन आफ इण्डिया (ए. आई. आर. 2004 एस. सी. 1442) के मामले में सूचना के अधिकार को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंग माना गया है।
प्रश्न - सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अनूसार वह कौन सा प्रकरण है जिसमें सूचना के अधिकार को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंग माना गया है?
उत्तर: पीपुल्स युनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम युनियन आफ इण्डिया (ए. आई. आर. 2004 एस. सी. 1442) के मामले में सूचना के अधिकार को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंग माना गया है।
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