Skip to main content

डी.एन.ए. टेस्ट (Deoxiribo Nucleic Acid)

 डी.एन.ए. परीक्षण अत्यन्त तार्किक और सम्पर्ण वैज्ञानिक माध्यम है पति ने पत्नी के विरूद्ध विवाह शून्य घोषित करने की याचिका विचारण न्यायालय में इस आधार पर प्रस्तुत की, कि विवाह के समय पत्नी गर्भवती थी। विवाह के लिए सहमति कपट से प्राप्त की गई । प्रार्थी पति उत्पन्न संतान का पिता नहीं है। डी.एन.ए. रिपोर्ट में प्रार्थी, उत्पन्न संतान का जैविक पिता सिद्ध नहीं । विचारण न्यायालय ने प्रार्थी पति की याचिका निरस्त की। केरल उच्च न्यायालय ने अपील में यह धारित किया कि विवाह की सहमति कपट से प्राप्त की गई थी। अपीलार्थी पति, प्रत्यर्थी पत्नी को उत्पन्न संतान का जैविक पिता नहीं होना प्रमाणित । अपील स्वीकार कर विवाह-विच्छेद डिक्री पारित की गई। पैतृकता के प्रश्न का विनिश्य करने की शक्ति आनुषंगिक रूप से कुटुम्ब न्यायालय को है। पत्नी ने विवाह के 7 माह पश्चात् संतान को जन्म दिया । पति ने पैतृकता के निर्धारण हेतु डी.एन.ए. टेस्ट के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। पक्षकार इस संबंध में साक्ष्य प्रस्तुत कर सकते है। इस प्रकरण पर डी.एन.ए. टेस्ट की आवश्यकता नहीं । शिशु के कल्याण को दृष्टिगत करते हुए डी.एन.ए. टेस्ट से इंकार किया गया।


पैतृकता के निर्धारण के लिए डी.एन.ए. टेस्ट रिपोर्ट सटीक सबूत (Accurate Proof) है। मा. सर्वोच्च न्यायालय ने नन्दलाल वासुदेव बडवेक बनाम लता बडवेक के प्रसिद्ध मामले में अपीलार्थी पति के निवेदन पर प्रत्यर्थी पत्नी की पुत्री के पितृत्व निर्धारण हेतु दो बार डी.एन.ए. टेस्ट के आदेश दिये। डी.एन.ए. टेस्ट रिपोर्ट में अपीलार्थी, प्रत्यर्थी की पुत्री का जैविक पिता होना नहीं पाया गया। अपीलार्थी ने अधीनस्थ न्यायालय के इस आदेश के विरूद्ध अपील प्रस्तुत की थी कि वह प्रत्यर्थी को 900/- प्रतिमाह तथा उसकी पुत्री को 500/- प्रतिमाह भरण-पोषण की राशि अदा करे। मा. सर्वोच्च न्यायालय ने यह धारित किया कि पितृत्व निर्धारण के लिए डी.एन.ए. टेस्ट रिपोर्ट सटीक सबूत है जो प्रगतिशील वैज्ञानिक निष्कर्ष पर आधारित है जिसे विधि पर वरीयता देनी होगी। "सत्य की सदैव जीत होती है" यह न्याय का प्रतीक चिन्ह है। ऐसे मामलों में धारा 112 साक्ष्य अधिनियम, 1872 के उपबंधों पर डी.एन.ए. टेस्ट रिपोर्ट को अधिमानता दिया जाना आवश्यक है। किंतु इसका प्रभाव अबोध संतान को अभागा (Bastard) • निरूपित करना नहीं है। अपील स्वीकार कर अपीलार्थी को भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त किया गया ।


पत्नी की परगमन जीवन शैली आरोपित कर, इस आधार पर विवाह-विच्छेद चाहा गया । प्रत्यर्थी पति ने स्वयं के तथा उसकी पत्नी से उत्पन्न पुरूष बालक के डी.एन.ए. परीक्षण के लिये आवेदन प्रस्तुत किया। डी.एन.ए. टेस्ट का उद्देश्य अपीलार्थी पत्नी की गैर वफादारी/ दुश्चरिता को और बच्चे के "जायज" होने को स्थापित करना प्रतीत । साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 आकर्षित नहीं होती है। प्रत्यर्थी ऐसा अनुभव करता है कि पत्नी की दुश्चरिता और वह बच्चे का पिता नहीं है, के उसके आरोप को सिद्ध करने का यही एकमात्र संभव उपाय है। डी.एन.ए. टेस्ट अत्यन्त तार्किक और सम्पूर्ण वैज्ञानिक माध्यम है, जो पति, पत्नी की दुश्चरित्रता के उसके प्राख्यान को सिद्ध करने के लिये उपयोग में ला सकता है। साथ ही इसे पत्नी द्वारा पति के प्राख्याने का खंडन करने के लिए भी उपयोग में लाया जा सकता है। उच्च न्यायालय द्वारा डी.एन.ए. परीक्षण का आदेश स्थिर रखा गया, इस पूर्व सूचना के साथ पत्नी को यह स्वतंत्रता दी जाती है कि वह उच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन करे। यदि पत्नी आदेश के अनुपालन से इंकार करती है, तब साक्ष्य अधिनियम की धारा 144 के अधीन अनुमान रेखांकित कर आरोप निश्चित होंगे। आवेदक के प्रत्यर्थी की माँ से प्रेम संबंध । उनके शारीरिक संबंध के परिणामस्वरूप प्रत्यर्थी का जन्म हुआ। आवेदक ने प्रत्यर्थी अर्थात् अवयस्क पुत्र और उसकी माँ को स्वीकार करने तथा उत्तरदायित्व लेने से इंकार कर दिया। डी.एन.ए. परीक्षण से यह पाया गया कि प्रत्यर्थी आवेदक का पुत्र है। अतः वह वैध रूप से भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए हकदार है। आवश्यक तथ्यों का मूल्यांकन करने के पश्चात् विचारण न्यायालय ने प्रत्यर्थी के पक्ष में उचित रूप से भरण-पोषण की रकम नीयत की। याचिका में अभिवचन के अभाव एवं अस्पष्ट आक्षेप की स्थिति में न्यायालय डी.एन.ए. परीक्षण की प्रार्थना निरस्त कर सकता है। अपीलार्थी पति ने आरोप लगाया कि किसी समय उसकी पत्नी के अपीलार्थी के चचरे भाई से अवैध संबंध स्थापित हो गये थे। अपीलार्थी ने विचारण न्यायालय के समक्ष कहा कि हाल ही में जन्मा शिशु इन्ही अवैध संबंधों का परिणाम है, अतः डी.एन.ए. परीक्षण का आदेश दिया जाये । विचारण न्यायालय ने निवेदन स्वीकार किया, जिसके विरूद्ध अपील प्रस्तुत । विचारण न्यायालय ने विवेकाधिकार का उपयोग करने में कोई त्रुटि नहीं की क्योंकि अपीलार्थी का कोई अभिवचन नहीं था और आक्षेप अस्पष्ट थे। अपील निरस्त । यदि नमूना एकत्र करने में कोई त्रुटि नहीं की गई है और उससे छेड़छाड़ नहीं की गई है तो डी.एन.ए. रिपोर्ट स्वीकार की जानी चाहिए । डी.एन.ए. प्रोफाइलिंग न्यायालय संबंधी एक महत्वपूर्ण उपकरण है जो लगभग शत-प्रतिशत शुद्ध और सुनिश्चित है


Comments

Followers

बासी खबर की ताजगी

मंत्रिपरिषद की बैठक , दिनांक 09 जुलाई 2024

छत्तीसगढ़ प्रदेश के  मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में दिनांक 09 जुलाई 2024 को मंत्रालय महानदी भवन में मंत्रिपरिषद की बैठक आयोजित हुई। बैठक में निम्नानुसार महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए - मंत्रिपरिषद की बैठक में निर्णय लिया गया कि राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग तथा वन और जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा वन अधिकार अधिनियम के तहत व्यक्तिगत्त वन अधिकार पत्रधारकों की मृत्यु होने पर वारिसानों के नाम पर काबिज वन भूमि का हस्तांतरण राजस्व या वन अभिलेखों में दर्ज करने संबंधित कार्यवाही के लिए प्रक्रिया प्रारूप का अनुमोदन किया गया। इससे भविष्य में नक्शा का जिओ रिफ्रेंसिंग होने से भूखण्ड का आधार नंबर भी लिया जाएगा। इसका उपयोग नामांतरण, सीमांकन, बटवारा आदि में किया जाएगा। प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था के लिए मंत्रिपरिषद की बैठक में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को छत्तीसगढ़ राज्य में पूर्ण रूप से लागू करने का निर्णय लिया गया। नई शिक्षा नीति के तहत कक्षा 5वीं तक बच्चों को स्थानीय भाषा-बोली में शिक्षा दिए जाने का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ह

वन स्टॉप सेंटर : सामान्य जानकारी

सामान्य पूर्व धारणा : हम स्वयं या हमारे आसपास कई ऐसे परिवार है जो किन्ही कारणों से घरेलू विवादों और आपसी सामंजस्य के अभाव में अपनी वैवाहिक जीवन से त्रस्त है. पीड़ित पक्ष के चुप्पी का कारण परिस्थितिजन्य होने के साथ-साथ पुलिस या अन्य संबंधित शिकायतों से उनके सार्वजनिक  जीवन में एकांतता के अभाव की अनायास शंका या अति सामाजिक प्रतिष्ठा से निजी जीवन के रिश्ते में हुई खटास से बदनामी का डर होता है. ऐसे प्रकरण में आरोपी ( प्रत्यर्थी) इस डर का नाजायज फायदा उठाने का प्रयास करता है. उन्हें यह भ्रम होता है कि उनके कृत्यों को उसके आसपास की रहवासी आम जनता हर बार नजरंदाज करते  रहेंगे, ऐसे में इस लेख के माध्यम से हम एक आम जागरूक नागरिक की भूमिका में समाज को विधि द्वारा स्थापित संस्थानों से परिचय कराना चाहते है जिससे जनमानस को ऐसे संस्थानों का महत्व पता चले. शुरुआत करते है ' वन स्टॉप सेंटर' से...     हिंसा से प्रभावित महिलाओं को सहायता प्रदान करने के लिए 01 अप्रैल , 2015 से वन स्टॉप सेंटर/ ओएससी/साक्षी केंद्र स्थापित करने की स्कीम क्रियान्वित कर रहा है। स्कीम का उद्देश्य हिंसा से प्रभावित महिलाओ

जिला एवं सत्र न्यायालय बिलासपुर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

वर्तमान न्यायधानी बिलासपुर ब्रिटिश काल में छत्तीसगढ़ संभाग में शामिल था और उस संभाग के आयुक्त की देखरेख में था। यह उस डिवीजन के डिविजनल जज के अधिकार क्षेत्र में था जो सत्र न्यायाधीश कहलाता था। सभी अदालतें नागपुर में न्यायिक आयुक्त के अधीन थीं। पूर्व में सक्ती और रायगढ़ तथा उत्तर में रीवा के देशी राज्यों में रेलवे सीमा के भीतर और सक्ति , रायगढ़ तथा कवर्धा के देशी राज्यों में यूरोपीय ब्रिटिश विषयों पर भी उनका अधिकार क्षेत्र था। उनके पास पूर्ण शक्तियों का प्रयोग करने वाले चार सहायकों का स्वीकृत स्टाफ था I जिला पंचायत कार्यालय बिलासपुर के ठीक सामने स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय बिलासपुर में आज दिनांक 14 मार्च 2024 को जिला अधिवक्ता संघ निर्वाचन 2024 की मतगणना संपन्न करा लिया जाएगा जिसके पश्चात् जिला अधिवक्ता संघ अपने कार्यकारिणी सदस्यों के साथ इसकी दशा और दिशा तय करने में अपनी महती भूमिका निभाएँगे ...     कोरबा एवं  जांजगीर-चांपा राजस्व जिले में स्थानांतरण  जिले को तीन तहसीलों बिलासपुर , जांजगीर और मुंगेली में विभाजित किया गया था , प्रत्येक तहसील एक सहायक के अधीन एक सब-डिवीज़न थी , जहाँ स